अमेरिकी शेयर बाजार इस समय रिकॉर्ड ऊंचाइयों पर है, लेकिन इस तेजी के पीछे एक ऐसा सच छिपा है जो फाइनेंशियल वल्र्ड की चिंता बढ़ा रहा है। असल में अमरीका में निवेशकों ने अब तक का सबसे बड़ा दांव ‘उधार के पैसे’ पर लगा दिया है। अप्रैल 2026 में अमेरिका की मार्जिन डेब्ट (Margin Trade Funding) बढक़र रिकॉर्ड 1.3 ट्रिलियन डॉलर पर पहुंच गई है। सिर्फ एक साल में इसमें 453 अरब डॉलर यानी 53' की विस्फोटक बढ़ोतरी हुई है। यह आंकड़ा सिर्फ एक रिकॉर्ड नहीं है, बल्कि बाजार में बढ़ते जोखिम का संकेत भी है। मार्जिन डेब्ट का मतलब है कि निवेशक ब्रोकर्स से पैसा उधार लेकर शेयर खरीद रहे हैं। जब बाजार ऊपर जाता है तो मुनाफा कई गुना बढ़ जाता है, लेकिन गिरावट आने पर यही लीवरेज तबाही का कारण बनता है एक्सपर्टर्स के अनुसार अभी अमेरिकी इकोनॉमी के मुकाबले मार्जिन डेब्ट का स्तर 5.2% तक पहुंच चुका है। यह 2008 के फाइनेंशियल क्राइसिस से पहले के स्तर से भी करीब 3 प्रतिशत अंक ज्यादा है। इतना ही नहीं, यह 2000 के डॉट-कॉम बबल के समय के स्तर को भी पीछे छोड़ चुका है। इतिहास बताता है कि जब-जब बाजार में अत्यधिक लीवरेज बढ़ा है, उसके बाद किसी बड़े करेक्शन या संकट की संभावना भी बढ़ी है। 2023 के बाद से निवेशकों ने तेजी से कर्ज लेकर निवेश बढ़ाया। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, टेक्नोलॉजी और मेगा-कैप स्टॉक्स में आई जबरदस्त रैली ने लोगों को यह भरोसा दिला दिया कि बाजार सिर्फ ऊपर ही जाएगा। नतीजा यह हुआ कि रिटेल इंवेस्टरों से लेकर बड़े फंड्स तक, सभी ने अधिक रिटर्न के लालच में लीवरेज का सहारा लिया लेकिन खतरा यहीं छिपा है। अगर बाजार में अचानक गिरावट आती है, तो ब्रोकर्स ‘मार्जिन कॉल’ जारी करते हैं। इसका मतलब निवेशकों को तुरंत अतिरिक्त पैसा जमा करना पड़ता है या फिर उनके शेयर जबरन बेच दिए जाते हैं। यही प्रक्रिया कई बार बाजार में गिरावट को और तेज कर देती है। 2008 के संकट और 2020 के कोविड क्रैश में भी यही देखने को मिला था। वॉल स्ट्रीट फिलहाल रिकॉर्ड उत्साह में है, लेकिन कुछ विश्लेषकों का मानना है कि यह तेजी अब ‘ओवरहीट’ हो चुकी है। जब बाजार की रैली वास्तविक कमाई और आर्थिक ग्रोथ से ज्यादा कर्ज पर टिकने लगे, तब जोखिम तेजी से बढऩे लगता है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है-क्या अमेरिका का शेयर बाजार एक और ऐतिहासिक बुलबुले की तरफ बढ़ रहा है, या फिर यह नई टेक्नोलॉजी आधारित लंबी बुल रन की शुरुआत है? फिलहाल इतना तय है कि बाजार में पैसा जितनी तेजी से बन रहा है, डर भी उतनी ही तेजी से बढ़ रहा है।
