शेयर बाजार में भारी उतार-चढ़ाव के बावजूद निवेशकों का भरोसा इंडेक्स फंड और इक्विटी ईटीएफ पर लगातार बढ़ रहा है। बाजार में गिरावट आने पर बड़ी संख्या में निवेशकों ने इन योजनाओं में पैसा लगाया, क्योंकि इन्हें सुरक्षित और कम खर्च वाला निवेश विकल्प माना जा रहा है। मार्च में सेंसेक्स और निफ्टी में करीब 11 फीसदी की गिरावट आई। इस दौरान निवेशकों ने मौके का फायदा उठाते हुए इंडेक्स फंड और ईटीएफ में जमकर निवेश किया। आंकड़ों के मुताबिक, मार्च में इक्विटी ईटीएफ में ?23,820 करोड़ और इंडेक्स फंड में ?6,415 करोड़ का निवेश आया। यह पिछले कई वर्षों में सबसे मजबूत निवेश प्रवाह में से एक रहा। बाजार में गिरावट की बड़ी वजह पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें और विदेशी निवेशकों की बिकवाली रही। इन कारणों से निवेशकों की संपत्ति में बड़ी कमी आई, लेकिन इसके बावजूद लोगों ने निवेश जारी रखा। अप्रैल में बाजार संभलने लगा तो निवेश का रुख और मजबूत हो गया। इस महीने ईटीएफ में 10,218 करोड़ रुपए और इंडेक्स फंड में 9,668 करोड़ रुपए का निवेश दर्ज किया गया। इससे साफ है कि निवेशक अब छोटी अवधि के उतार-चढ़ाव से ज्यादा लंबी अवधि के फायदे पर ध्यान दे रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इंडेक्स फंड में बड़ी और मजबूत कंपनियां शामिल होती हैं। साथ ही इनका पोर्टफोलियो समय-समय पर बदला जाता है, जिससे निवेशकों को अलग-अलग कंपनियों में निवेश का फायदा मिलता है। इन फंडों की एक और बड़ी खासियत इनका कम खर्च है। ज्यादातर निफ्टी 50 इंडेक्स फंड का खर्च बहुत कम होता है, जिससे निवेशकों को ज्यादा रिटर्न मिलने की संभावना रहती है। बाजार जानकारों का मानना है कि अगर आने वाले महीनों में भी बाजार में उतार-चढ़ाव बना रहता है, तो इंडेक्स फंड और ईटीएफ में निवेश और बढ़ सकता है। कम खर्च, आसान निवेश और लंबी अवधि में अच्छे नतीजों की वजह से ये विकल्प तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं।
आर्थिक संकट में क्यों बढ़ जाते हैं कॉरपोरेट फ्रॉड? : जब भी दुनिया किसी बड़े आर्थिक संकट से गुजरती है, उसका असर सिर्फ शेयर बाजार या कारोबार पर ही नहीं पड़ता, बल्कि कंपनियों के काम करने के तरीके पर भी दिखने लगता है। ऐसे समय में कई कंपनियों पर अच्छा प्रदर्शन दिखाने का दबाव बढ़ जाता है। यही दबाव कई बार गलत फैसलों और वित्तीय गड़बडिय़ों की वजह बनता है। हाल के कई शोध बताते हैं कि जब बाजार में अनिश्चितता बढ़ती है, तब कंपनियों में वित्तीय धोखाधड़ी का खतरा भी बढ़ जाता है। निवेशकों का भरोसा बनाए रखने, शेयर कीमतों को संभालने और घाटे को छिपाने के लिए कुछ कंपनियां अपने आंकड़ों को वास्तविकता से बेहतर दिखाने की कोशिश करती हैं। कोविड-19 के दौरान भी ऐसा ही देखा गया। महामारी की वजह से कारोबार प्रभावित हुए, आय घटी और कई कंपनियां दबाव में आ गईं। ऐसे माहौल में गलत वित्तीय रिपोर्ट देने या महत्वपूर्ण जानकारी छिपाने के मामलों का जोखिम बढ़ गया। विशेषज्ञों का मानना है कि जब किसी कंपनी पर कर्ज ज्यादा हो या मुनाफा कम हो रहा हो, तब ऐसे जोखिम और बढ़ जाते हैं। दुनिया में कई बड़े कॉरपोरेट घोटाले इसी तरह सामने आए हैं। शुरुआत में कंपनियां शानदार प्रदर्शन का दावा करती रहीं, लेकिन बाद में पता चला कि आंकड़ों में गड़बड़ी की गई थी। इसका सबसे बड़ा नुकसान निवेशकों, कर्मचारियों और आम लोगों को उठाना पड़ा। भारत में भी समय-समय पर ऐसे मामले सामने आए हैं, जिन्होंने ऑडिट सिस्टम और कंपनी प्रबंधन पर सवाल खड़े किए। इसके बाद नियामक संस्थाओं ने नियमों को और सख्त बनाया, ताकि कंपनियां सही जानकारी दें और निवेशकों का भरोसा बना रहे। विशेषज्ञ कहते हैं कि फ्रॉड केवल एक व्यक्ति की गलती नहीं होता। इसके पीछे कमजोर निगरानी, ढीले नियम और जवाबदेही की कमी भी बड़ी वजह होती है। इसलिए कंपनियों को मजबूत निगरानी व्यवस्था, साफ-सुथरी रिपोर्टिंग और ईमानदार प्रबंधन पर ध्यान देना चाहिए।आज के समय में निवेशकों को सिर्फ कंपनी के मुनाफे पर नहीं, बल्कि उसके काम करने के तरीके और पारदर्शिता पर भी नजर रखनी चाहिए। क्योंकि मजबूत कंपनी वही है जो मुश्किल समय में भी सच छिपाने के बजाय खुलकर अपनी स्थिति बताती है। सीधी बात यह है कि आर्थिक संकट कंपनियों की असली परीक्षा लेते हैं। जो कंपनियां ईमानदारी और पारदर्शिता के साथ काम करती हैं, वही लंबे समय तक निवेशकों का भरोसा जीत पाती हैं।
