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Daily Business Newspaper | A Knowledge Powerhouse in Hindi

01-06-2026

असली मुश्किल सही शेयर चुनना नहीं, उसे पकड़े रखना है...

  •  आज के समय में निवेश की दुनिया पहले से कहीं ज्यादा तेज, चमकदार और शोर से भरी हुई हो गई है। सोशल मीडिया खोलते ही हर तरफ ऐसी कहानियाँ दिखाई देती हैं जिनमें कोई व्यक्ति छोटी-सी कंपनी में पैसा लगाकर कुछ ही वर्षों में अरबपति बन गया। कहीं कोई ‘अगला मल्टीबैगर’ खोजने की बात कर रहा है, तो कहीं कोई यह दावा कर रहा है कि उसने आने वाले समय की सबसे बड़ी कंपनी पहले ही पहचान ली है। हाल के दिनों में सैम बैंकमैन-फ्राइड को लेकर भी इंटरनेट पर ऐसी ही चर्चाएँ तेज रहीं। कई पोस्टों में उन्हें एक ऐसा ‘दूर की सोच रखने वाला निवेशक’ बताया गया जिसने एन्थ्रॉपिक, कर्सर, सोलाना, स्पेसएक्स और रॉबिनहुड जैसी कंपनियों और परियोजनाओं में बहुत पहले पैसा लगाया था। दावा किया गया कि अगर एफटीएक्स का संकट नहीं आता और उसकी हिस्सेदारियाँ मजबूरी में नहीं बेची जातीं, तो आज उसकी संपत्ति दुनिया के सबसे बड़े निवेशकों से भी आगे होती। यह कहानी सुनने में बेहद आकर्षक लगती है।लेकिन निवेश की दुनिया में आकर्षक कहानियाँ हमेशा पूरी सच्चाई नहीं बतातीं। असल बात यह है कि निवेश में सबसे मुश्किल काम सही शेयर चुनना नहीं होता। सबसे कठिन काम होता है उस निवेश को लंबे समय तक संभालकर रखना। यही वह चीज है जो ज्यादातर लोग समझ नहीं पाते। सैम बैंकमैन-फ्राइड की कहानी भी यही सिखाती है। उसकी सबसे बड़ी समस्या यह नहीं थी कि उसने गलत जगह पैसा लगाया। सच तो यह है कि उसके कई निवेश अच्छे निकले। समस्या यह थी कि उसके पास उन निवेशों को लंबे समय तक पकड़े रखने की ताकत ही नहीं थी। क्योंकि जिन पैसों से निवेश किए गए थे, वे उसके अपने नहीं थे। वह ग्राहकों के पैसों का इस्तेमाल कर रहा था। जब एफटीएक्स डूबा, तब अदालत और कानून के तहत उसकी संपत्तियाँ बेचनी पड़ीं ताकि लोगों का पैसा वापस लौटाया जा सके। बहुत से लोग आज यह कहते हैं कि अगर वे हिस्सेदारियां कुछ साल और रखी जातीं तो उनकी कीमत कई गुना बढ़ जाती। लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि ऐसा होना संभव ही नहीं था। जिस व्यक्ति ने दूसरों का पैसा गलत तरीके से इस्तेमाल किया हो, उसे वर्षों तक आराम से बैठकर इंतजार करने की आजादी नहीं मिल सकती। यहीं निवेश की सबसे बड़ी सीख छिपी हुई है। लंबे समय तक निवेश में टिके रहने के लिए सिर्फ अच्छा दिमाग काफी नहीं होता।

    इसके लिए मजबूत हालात भी चाहिए। ऐसा पैसा चाहिए जो आपका अपना हो। ऐसा समय चाहिए जिसमें आपको जल्दी पैसा निकालने की मजबूरी न हो। और सबसे जरूरी, ऐसा धैर्य चाहिए जो बाजार की हर गिरावट में टूटे नहीं। जब बाजार तेजी से गिरता है, तब असली परीक्षा शुरू होती है। हर निवेशक को शुरुआत में लगता है कि वह लंबे समय तक निवेश में बना रहेगा। लेकिन जब पोर्टफोलियो में 30' या 40' गिरावट दिखाई देने लगती है, तब डर हावी होने लगता है। समाचार चैनल डर फैलाने लगते हैं। सोशल मीडिया पर लोग बाजार खत्म होने जैसी बातें करने लगते हैं।दोस्त और रिश्तेदार सलाह देने लगते हैं कि अब बेच दो, आगे और गिरावट आएगी। यही वह समय होता है जब ज्यादातर लोग हार मान लेते हैं। लेकिन इतिहास बताता है कि बाजार हमेशा गिरावट से वापस उभरा है। 2008 की वैश्विक मंदी में लोगों को लगा था कि दुनिया की अर्थव्यवस्था खत्म हो जाएगी। कोविड के समय बाजार कुछ ही दिनों में बुरी तरह टूट गया था। भारत में नोटबंदी, महंगाई, युद्ध और कई बड़े संकटों के दौरान भी निवेशकों में डर फैला। फिर भी जो लोग निवेश में टिके रहे, उन्हें समय के साथ फायदा मिला। यही वजह है कि वॉरेन बफेट हमेशा धैर्य की बात करते हैं। लेकिन धैर्य सिर्फ अच्छी बातें पढ़ लेने से नहीं आता। धैर्य तभी आता है जब आपकी आर्थिक स्थिति मजबूत हो और आपका निवेश मजबूरी में बिकने वाला न हो। अगर किसी ने उधार लेकर निवेश किया हो, अगर हर महीने की किस्त का दबाव हो, अगर घर के खर्च के लिए वही पैसा चाहिए हो, तो बाजार गिरते ही घबराहट होना स्वाभाविक है। ऐसे हालात में सबसे अच्छे शेयर भी लंबे समय तक नहीं पकड़े जा सकते। दूसरी तरफ एक साधारण एसआईपी निवेशक को देखिए। वह शायद कभी टीवी की बहसों में दिखाई नहीं देगा। उसके निवेश की कहानी सोशल मीडिया पर वायरल नहीं होगी। लेकिन असली दौलत अक्सर वही लोग बनाते हैं। जिस व्यक्ति ने हर महीने थोड़ी-थोड़ी रकम अच्छे म्यूचुअल फंड में लगाई, जिसने बाजार की गिरावटों के बावजूद निवेश जारी रखा, जिसने जल्दी अमीर बनने की जगह धीरे-धीरे आगे बढऩे का रास्ता चुना—लंबे समय में वही निवेशक मजबूत स्थिति में पहुंचता है। उसने शायद कोई ‘अगला बड़ा शेयर’ नहीं खोजा।लेकिन उसने एक जरूरी चीज हासिल की—निरंतरता। और निवेश की दुनिया में निरंतरता ही सबसे बड़ी ताकत है। सोशल मीडिया की दुनिया तेज सफलता की कहानियाँ बेचती है। वहाँ रातोंरात करोड़पति बनने वाले लोगों की बातें होती हैं। वहाँ ऐसा लगता है जैसे निवेश सिर्फ सही समय पर सही शेयर चुनने का खेल हो। लेकिन असली दुनिया इससे बिल्कुल अलग है। यहाँ दौलत धीरे-धीरे बनती है।सालों की बचत से बनती है। अनुशासन से बनती है।गलत समय में भी शांत रहने से बनती है। निवेश में सबसे बड़ा फायदा तेज दिमाग से नहीं, बल्कि लंबे समय तक टिके रहने से मिलता है। क्योंकि आखिर में बाजार उसी इंसान को सबसे ज्यादा इनाम देता है जो डर, लालच और शोर के बीच भी निवेश में बना रहता है।

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असली मुश्किल सही शेयर चुनना नहीं, उसे पकड़े रखना है...

 आज के समय में निवेश की दुनिया पहले से कहीं ज्यादा तेज, चमकदार और शोर से भरी हुई हो गई है। सोशल मीडिया खोलते ही हर तरफ ऐसी कहानियाँ दिखाई देती हैं जिनमें कोई व्यक्ति छोटी-सी कंपनी में पैसा लगाकर कुछ ही वर्षों में अरबपति बन गया। कहीं कोई ‘अगला मल्टीबैगर’ खोजने की बात कर रहा है, तो कहीं कोई यह दावा कर रहा है कि उसने आने वाले समय की सबसे बड़ी कंपनी पहले ही पहचान ली है। हाल के दिनों में सैम बैंकमैन-फ्राइड को लेकर भी इंटरनेट पर ऐसी ही चर्चाएँ तेज रहीं। कई पोस्टों में उन्हें एक ऐसा ‘दूर की सोच रखने वाला निवेशक’ बताया गया जिसने एन्थ्रॉपिक, कर्सर, सोलाना, स्पेसएक्स और रॉबिनहुड जैसी कंपनियों और परियोजनाओं में बहुत पहले पैसा लगाया था। दावा किया गया कि अगर एफटीएक्स का संकट नहीं आता और उसकी हिस्सेदारियाँ मजबूरी में नहीं बेची जातीं, तो आज उसकी संपत्ति दुनिया के सबसे बड़े निवेशकों से भी आगे होती। यह कहानी सुनने में बेहद आकर्षक लगती है।लेकिन निवेश की दुनिया में आकर्षक कहानियाँ हमेशा पूरी सच्चाई नहीं बतातीं। असल बात यह है कि निवेश में सबसे मुश्किल काम सही शेयर चुनना नहीं होता। सबसे कठिन काम होता है उस निवेश को लंबे समय तक संभालकर रखना। यही वह चीज है जो ज्यादातर लोग समझ नहीं पाते। सैम बैंकमैन-फ्राइड की कहानी भी यही सिखाती है। उसकी सबसे बड़ी समस्या यह नहीं थी कि उसने गलत जगह पैसा लगाया। सच तो यह है कि उसके कई निवेश अच्छे निकले। समस्या यह थी कि उसके पास उन निवेशों को लंबे समय तक पकड़े रखने की ताकत ही नहीं थी। क्योंकि जिन पैसों से निवेश किए गए थे, वे उसके अपने नहीं थे। वह ग्राहकों के पैसों का इस्तेमाल कर रहा था। जब एफटीएक्स डूबा, तब अदालत और कानून के तहत उसकी संपत्तियाँ बेचनी पड़ीं ताकि लोगों का पैसा वापस लौटाया जा सके। बहुत से लोग आज यह कहते हैं कि अगर वे हिस्सेदारियां कुछ साल और रखी जातीं तो उनकी कीमत कई गुना बढ़ जाती। लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि ऐसा होना संभव ही नहीं था। जिस व्यक्ति ने दूसरों का पैसा गलत तरीके से इस्तेमाल किया हो, उसे वर्षों तक आराम से बैठकर इंतजार करने की आजादी नहीं मिल सकती। यहीं निवेश की सबसे बड़ी सीख छिपी हुई है। लंबे समय तक निवेश में टिके रहने के लिए सिर्फ अच्छा दिमाग काफी नहीं होता।

इसके लिए मजबूत हालात भी चाहिए। ऐसा पैसा चाहिए जो आपका अपना हो। ऐसा समय चाहिए जिसमें आपको जल्दी पैसा निकालने की मजबूरी न हो। और सबसे जरूरी, ऐसा धैर्य चाहिए जो बाजार की हर गिरावट में टूटे नहीं। जब बाजार तेजी से गिरता है, तब असली परीक्षा शुरू होती है। हर निवेशक को शुरुआत में लगता है कि वह लंबे समय तक निवेश में बना रहेगा। लेकिन जब पोर्टफोलियो में 30' या 40' गिरावट दिखाई देने लगती है, तब डर हावी होने लगता है। समाचार चैनल डर फैलाने लगते हैं। सोशल मीडिया पर लोग बाजार खत्म होने जैसी बातें करने लगते हैं।दोस्त और रिश्तेदार सलाह देने लगते हैं कि अब बेच दो, आगे और गिरावट आएगी। यही वह समय होता है जब ज्यादातर लोग हार मान लेते हैं। लेकिन इतिहास बताता है कि बाजार हमेशा गिरावट से वापस उभरा है। 2008 की वैश्विक मंदी में लोगों को लगा था कि दुनिया की अर्थव्यवस्था खत्म हो जाएगी। कोविड के समय बाजार कुछ ही दिनों में बुरी तरह टूट गया था। भारत में नोटबंदी, महंगाई, युद्ध और कई बड़े संकटों के दौरान भी निवेशकों में डर फैला। फिर भी जो लोग निवेश में टिके रहे, उन्हें समय के साथ फायदा मिला। यही वजह है कि वॉरेन बफेट हमेशा धैर्य की बात करते हैं। लेकिन धैर्य सिर्फ अच्छी बातें पढ़ लेने से नहीं आता। धैर्य तभी आता है जब आपकी आर्थिक स्थिति मजबूत हो और आपका निवेश मजबूरी में बिकने वाला न हो। अगर किसी ने उधार लेकर निवेश किया हो, अगर हर महीने की किस्त का दबाव हो, अगर घर के खर्च के लिए वही पैसा चाहिए हो, तो बाजार गिरते ही घबराहट होना स्वाभाविक है। ऐसे हालात में सबसे अच्छे शेयर भी लंबे समय तक नहीं पकड़े जा सकते। दूसरी तरफ एक साधारण एसआईपी निवेशक को देखिए। वह शायद कभी टीवी की बहसों में दिखाई नहीं देगा। उसके निवेश की कहानी सोशल मीडिया पर वायरल नहीं होगी। लेकिन असली दौलत अक्सर वही लोग बनाते हैं। जिस व्यक्ति ने हर महीने थोड़ी-थोड़ी रकम अच्छे म्यूचुअल फंड में लगाई, जिसने बाजार की गिरावटों के बावजूद निवेश जारी रखा, जिसने जल्दी अमीर बनने की जगह धीरे-धीरे आगे बढऩे का रास्ता चुना—लंबे समय में वही निवेशक मजबूत स्थिति में पहुंचता है। उसने शायद कोई ‘अगला बड़ा शेयर’ नहीं खोजा।लेकिन उसने एक जरूरी चीज हासिल की—निरंतरता। और निवेश की दुनिया में निरंतरता ही सबसे बड़ी ताकत है। सोशल मीडिया की दुनिया तेज सफलता की कहानियाँ बेचती है। वहाँ रातोंरात करोड़पति बनने वाले लोगों की बातें होती हैं। वहाँ ऐसा लगता है जैसे निवेश सिर्फ सही समय पर सही शेयर चुनने का खेल हो। लेकिन असली दुनिया इससे बिल्कुल अलग है। यहाँ दौलत धीरे-धीरे बनती है।सालों की बचत से बनती है। अनुशासन से बनती है।गलत समय में भी शांत रहने से बनती है। निवेश में सबसे बड़ा फायदा तेज दिमाग से नहीं, बल्कि लंबे समय तक टिके रहने से मिलता है। क्योंकि आखिर में बाजार उसी इंसान को सबसे ज्यादा इनाम देता है जो डर, लालच और शोर के बीच भी निवेश में बना रहता है।


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