ध्यान मार्ग से अपूर्व घड़ी है जब मन न चले। अनंत ऊर्जा है हमारे पास लेकिन प्रश्न है कैसे जगायें? वातावरण में जो कार्बन है, वही हमारी प्रदूषण की समस्या है, जिससे विकारों की प्रबल सम्भावना है। गुणतंत्र ही विकल्प है। ज्ञान ही मुक्ति है। मनुष्य की संवेदनहीनता ही पर्यावरण प्रदूषण है। हमारी सोच से शरीर की हर कोशिका होती है प्रभावित- क्रोध, ईष्र्या, डांट, मिथ्या आग्रह दुर्गुण है, जिसके कारण मनुष्य के गुणों का नाश होता है। जिसके कारण असाधन को भी साधन बनाकर व्यक्ति अत्यधिक दौलत संचय करता है। वृत्तियों का संक्षेपीकरण करने से इंद्रियों का निग्रह होता है। परिणाम में व्यक्ति बर्हिमुखी बनने के बजाय अंर्तमुखी बनता है। अन्र्तमुखी बनने से जीवन में क्रांति आती है। अब तक तो जीवन में नहीं मिल सका, वह सब कुछ शांति, मुक्ति एवं चिर प्रसन्नता मिल सकती है। यह तब सम्भव है जबकि जाने हुए असत का त्याग कर दें। ममत्व रहित हो जायें। असाक्ति और जड़ता के बंधनों से मुक्त हो जायें। तभी हमारा जीवन आनंदमय होना सम्भव है।