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19-05-2026

स्केल नहीं प्रोडक्टिविटी है रियल गेम चेंजर

  •  भारत और चीन की पॉपुलेशन बराबर है। वर्ष 2025 में चीन में 3 करोड़ पैसेंजर वेहीकल बने जबकि भारत में करीब 50 लाख। एनेलिस्ट इसे स्केल के साथ ही प्रोडक्टिविटी गैप भी कहते हैं। एनेलिस्ट यह भी कहते हैं कि स्केल बढऩे से प्रोडक्टिविटी अपने-आप बढऩे लगती है। भारत के इनफॉर्मल या कहें तो असंगठित सैक्टर अनप्रोडक्टिव है। इनफॉर्मल सैक्टर में एग्रीकल्चर, स्मॉल ट्रेडिंग, रेां, ट्रांसपोर्ट, मेंटीनेंस, कॉटेज यूनिट आदि आते हैं जो देश में रोजगार का बड़ा जरिया हैं। अनइनकॉर्पोरेटेड सेक्टर एंटरप्राइजेज के सालाना सर्वे (्रस्स्श्व) के डेटा के अनुसार वर्ष 2025 में भारत में लगभग 8 करोड़ गैर-कृषि (नॉन- एग्रीकल्चर) स्मॉल वेंचर थे जिनमें 12 करोड़ से अधिक लोग काम कर रहे थे। ओन-अकाउंट एंटरप्राइजेज (ओएई) यानी ऐसी बिजनस जिन्हें मालिक ही चलाता है और जिनमें कर्मचारी नहीं होते का शेयर 86.6 परसेंट हैं। वहीं हायर्ड-वर्कर एंटरप्राइजेज (एचडब्ल्यूई) यानी जिनमें कर्मचारी काम करते हैं केवल 13.4 परसेंट हैं। दोनों की प्रोडक्टिविटी के बीच का अंतर बहुत बड़ा है। एक औसत एचडब्ल्यूई सालाना लगभग 10 लाख रुपये का ग्रॉस वैल्यू एडेड (जीवीए) जेनरेट करता है, जबकि एक ओएई केवल 1.4 लाख रुपये का। सर्वे का नतीजा कहता है कि वन मैन शो यानी ओन-अकाउंट एंटरप्राइजेज (ओएई) में प्रति कर्मचारी जीवीए केवल 1.4 लाख रु. है वहीं हायर्ड-वर्कर एंटरप्राइजेज (एचडब्ल्यूई) यानी जिनमें कर्मचारी काम करते हैं उन संस्थानों में प्रति कर्मचारी जीवीए 2.3 लाख रुपये है। यदि बात कर्मचारी वाली कंपनी की करें तो उनका औसत सालाना जीवीए 10 लाख रुपये होता है जबकि ओएई में केवल 1.4 लाख रुपये। दूसरी ओर ओएई में केवल एक व्यक्ति (आमतौर पर मालिक) को रोजगार मिलता है जबकि हायर्ड-वर्कर एंटरप्राइजेज  में औसत पांच लोगों को। रिपोर्ट के अनुसार सिंगल ओनर मैन्युफैक्चरिंग यूनिट का प्रति कर्मचारी जीवीए केवल 72 हजार रुपये होता है जो कि सिंगल ओनर ट्रेडिंग या सर्विस यूनिट के मुकाबले आधा ही है। इस सर्वे में एक रोचक तथ्य सामने आया कि जब कोई मैन्युफैक्चरिंग ओएई अपना पहला कर्मचारी भर्ती करती है तो प्रति कर्मचारी प्रोडक्टिविटी 40 परसेंट से अधिक बढ़ जाती है। लेकिन ट्रेडिंग यूनिट की प्रोडक्टिविटी पहला कर्मचारी रखने के बाद वास्तव में 24 परसेंट गिर जाती है। ऐसा इसलिए क्योंकि ट्रेडिंग यूनिट जैसे किराना दुकान में पहला कर्मचारी (मालिक के इतर) आमतौर पर परिवार के अंदर का व्यक्ति होता है और वह ज्यादा संचालन में मदद करता है ना कि कारोबार का विस्तार करने में। रिपोर्ट के अनुसार यदि ट्रेडिंग और सर्विस यूनिट काम का कुछ विभाजन कर पाते हैं तो तीन कर्मचारियों (एक मालिक और दो कर्मचारी) के लेवल से प्रोडक्टिविटी दिखना शुरू हो जाती है। तीसरे कर्मचारी के बाद प्रोडक्टिविटी का फायदा एक्सपोनेंशियल ( कई गुना) बढ़ता है। लेकिन 9वें कर्मचारी से 10वें कर्मचारी तक पहुंचती हैं, तो प्रोडक्विटी तेजी से गिरने लगती है। एनेलिस्ट कहते हैं कि 10 कर्मचारियों की लिमिट पार करने के बाद कंप्लायंस का बोझ प्रोडक्टिविटी पर असर डालने लगता है। लेकिन मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स की प्रोडक्टिविटी 13 कर्मचारियों पर पीक लेवल पर पहुंच जाती है। वहीं ट्रेडिंग में यह पीक लेवल 9 कर्मचारियों पर ही आ जाता है। सर्विस सैक्टर में प्रोडक्विटिी 8वें कर्मचारी पर ही पीक लेवल पर पहुंच जाती है, 10 कर्मचारियों पर तेजी से गिरती है। एनेलिस्ट कहते हैं कि इससे पता चलता है कि कई सर्विस यूनिट्स बिजनस का विस्तार कर रहे हैं और अधिक खर्च भी कर रहे हैं, लेकिन विस्तार के मुकाबले प्रोडक्टिविटी में फायदा नहीं हासिल कर पा रहे हैं। कुल मिलाकर, पूरे इनफॉर्मल सैक्टर में प्रोडक्टिविटी 9 कर्मचारियों पर पीक पर होती है 20 कर्मचारियों के पार जाने के बाद भी इस लेवल पर नहीं आ पाती।

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स्केल नहीं प्रोडक्टिविटी है रियल गेम चेंजर

 भारत और चीन की पॉपुलेशन बराबर है। वर्ष 2025 में चीन में 3 करोड़ पैसेंजर वेहीकल बने जबकि भारत में करीब 50 लाख। एनेलिस्ट इसे स्केल के साथ ही प्रोडक्टिविटी गैप भी कहते हैं। एनेलिस्ट यह भी कहते हैं कि स्केल बढऩे से प्रोडक्टिविटी अपने-आप बढऩे लगती है। भारत के इनफॉर्मल या कहें तो असंगठित सैक्टर अनप्रोडक्टिव है। इनफॉर्मल सैक्टर में एग्रीकल्चर, स्मॉल ट्रेडिंग, रेां, ट्रांसपोर्ट, मेंटीनेंस, कॉटेज यूनिट आदि आते हैं जो देश में रोजगार का बड़ा जरिया हैं। अनइनकॉर्पोरेटेड सेक्टर एंटरप्राइजेज के सालाना सर्वे (्रस्स्श्व) के डेटा के अनुसार वर्ष 2025 में भारत में लगभग 8 करोड़ गैर-कृषि (नॉन- एग्रीकल्चर) स्मॉल वेंचर थे जिनमें 12 करोड़ से अधिक लोग काम कर रहे थे। ओन-अकाउंट एंटरप्राइजेज (ओएई) यानी ऐसी बिजनस जिन्हें मालिक ही चलाता है और जिनमें कर्मचारी नहीं होते का शेयर 86.6 परसेंट हैं। वहीं हायर्ड-वर्कर एंटरप्राइजेज (एचडब्ल्यूई) यानी जिनमें कर्मचारी काम करते हैं केवल 13.4 परसेंट हैं। दोनों की प्रोडक्टिविटी के बीच का अंतर बहुत बड़ा है। एक औसत एचडब्ल्यूई सालाना लगभग 10 लाख रुपये का ग्रॉस वैल्यू एडेड (जीवीए) जेनरेट करता है, जबकि एक ओएई केवल 1.4 लाख रुपये का। सर्वे का नतीजा कहता है कि वन मैन शो यानी ओन-अकाउंट एंटरप्राइजेज (ओएई) में प्रति कर्मचारी जीवीए केवल 1.4 लाख रु. है वहीं हायर्ड-वर्कर एंटरप्राइजेज (एचडब्ल्यूई) यानी जिनमें कर्मचारी काम करते हैं उन संस्थानों में प्रति कर्मचारी जीवीए 2.3 लाख रुपये है। यदि बात कर्मचारी वाली कंपनी की करें तो उनका औसत सालाना जीवीए 10 लाख रुपये होता है जबकि ओएई में केवल 1.4 लाख रुपये। दूसरी ओर ओएई में केवल एक व्यक्ति (आमतौर पर मालिक) को रोजगार मिलता है जबकि हायर्ड-वर्कर एंटरप्राइजेज  में औसत पांच लोगों को। रिपोर्ट के अनुसार सिंगल ओनर मैन्युफैक्चरिंग यूनिट का प्रति कर्मचारी जीवीए केवल 72 हजार रुपये होता है जो कि सिंगल ओनर ट्रेडिंग या सर्विस यूनिट के मुकाबले आधा ही है। इस सर्वे में एक रोचक तथ्य सामने आया कि जब कोई मैन्युफैक्चरिंग ओएई अपना पहला कर्मचारी भर्ती करती है तो प्रति कर्मचारी प्रोडक्टिविटी 40 परसेंट से अधिक बढ़ जाती है। लेकिन ट्रेडिंग यूनिट की प्रोडक्टिविटी पहला कर्मचारी रखने के बाद वास्तव में 24 परसेंट गिर जाती है। ऐसा इसलिए क्योंकि ट्रेडिंग यूनिट जैसे किराना दुकान में पहला कर्मचारी (मालिक के इतर) आमतौर पर परिवार के अंदर का व्यक्ति होता है और वह ज्यादा संचालन में मदद करता है ना कि कारोबार का विस्तार करने में। रिपोर्ट के अनुसार यदि ट्रेडिंग और सर्विस यूनिट काम का कुछ विभाजन कर पाते हैं तो तीन कर्मचारियों (एक मालिक और दो कर्मचारी) के लेवल से प्रोडक्टिविटी दिखना शुरू हो जाती है। तीसरे कर्मचारी के बाद प्रोडक्टिविटी का फायदा एक्सपोनेंशियल ( कई गुना) बढ़ता है। लेकिन 9वें कर्मचारी से 10वें कर्मचारी तक पहुंचती हैं, तो प्रोडक्विटी तेजी से गिरने लगती है। एनेलिस्ट कहते हैं कि 10 कर्मचारियों की लिमिट पार करने के बाद कंप्लायंस का बोझ प्रोडक्टिविटी पर असर डालने लगता है। लेकिन मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स की प्रोडक्टिविटी 13 कर्मचारियों पर पीक लेवल पर पहुंच जाती है। वहीं ट्रेडिंग में यह पीक लेवल 9 कर्मचारियों पर ही आ जाता है। सर्विस सैक्टर में प्रोडक्विटिी 8वें कर्मचारी पर ही पीक लेवल पर पहुंच जाती है, 10 कर्मचारियों पर तेजी से गिरती है। एनेलिस्ट कहते हैं कि इससे पता चलता है कि कई सर्विस यूनिट्स बिजनस का विस्तार कर रहे हैं और अधिक खर्च भी कर रहे हैं, लेकिन विस्तार के मुकाबले प्रोडक्टिविटी में फायदा नहीं हासिल कर पा रहे हैं। कुल मिलाकर, पूरे इनफॉर्मल सैक्टर में प्रोडक्टिविटी 9 कर्मचारियों पर पीक पर होती है 20 कर्मचारियों के पार जाने के बाद भी इस लेवल पर नहीं आ पाती।


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