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23-04-2026

दुर्घटना पीडि़तों को अच्छी गुणवत्ता वाले कृत्रिम अंग पाने का अधिकार: सुप्रीम कोर्ट

  •  उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को फैसला सुनाया कि मोटर दुर्घटना पीड़ितों को अच्छी गुणवत्ता वाले कृत्रिम अंग पाने का अधिकार है, जो उनके जीवन का अभिन्न अंग है। न्यायालय ने कहा कि वे लोग जो दुर्घटना में अंग गंवा देते हैं उनके लिए ऐसे कृत्रिम अंग दिव्यांगता दूर करने का तरीका होते हैं। न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति केवी विश्वनाथन की पीठ ने कहा कि कृत्रिम अंग केवल चिकित्सा उपकरण नहीं बल्कि अंग गंवा चुके व्यक्ति के आत्मविश्वास और सशक्तीकरण का एक अनिवार्य हिस्सा है।   शीर्ष अदालत ने ‘रेस्टिट्यूटियो इन इंटीग्रम’ (वापस मूल स्थिति में आना) के कानूनी सिद्धांत का हवाला देते हुए कहा कि अंग गंवा चुके लोगों के लिए कृत्रिम अंग दिव्यांगता दूर करने का तरीका होते हैं। ऐसे उपकरण उन्हें सशक्त बनाने के अलावा, उनके जीवन का अभिन्न अंग हैं, जो उन्हें आत्मविश्वास प्रदान करता है। इसकी अनिवार्यता को केवल दिव्यांग व्यक्ति ही बेहतर ढंग से समझ सकता है। उच्चतम न्यायालय का यह फैसला प्रहलाद सहाय की अपील पर आया, जो 2007 में हरियाणा रोडवेज की बस की टक्कर से दाहिना पैर गंवा बैठे थे।दुर्घटना के समय सहाय मोटरसाइकिल पर सवार थे।   मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण (एमसीएटी) ने शुरू में उन्हें 8.73 लाख रुपये का मुआवजा दिया था, जिसे बाद में राजस्थान उच्च न्यायालय ने बढ़ाकर 13.02 लाख रुपये कर दिया था। हालांकि, उच्चतम न्यायालय ने इन राशियों को अपर्याप्त पाया।   न्यायालय ने अब बीमा कंपनी को अतिरिक्त 36.20 लाख रुपये का भुगतान करने का आदेश दिया, जिससे उनका कुल मुआवजा लगभग 50 लाख रुपये हो गया है। न्यायालय ने बीमा कंपनी की इस दलील को खारिज कर दिया गया कि पीड़ितों को केवल सरकारी अधिसूचनाओं के आधार पर ही मुआवजा दिया जाना चाहिए।  पीठ ने कहा, बीमा कंपनी द्वारा उद्धृत सरकारी अधिसूचना में निर्धारित दरें, जो किसी भी स्थिति में बेहद कम हैं, उन्हें अस्वीकार करने में हमें कोई संकोच नहीं है। पीठ ने यह भी कहा कि पीड़ितों को अपनी व्यक्तिगत आवश्यकताओं के अनुरूप उपकरण उपलब्ध कराने वाले निजी केंद्रों को चुनने का अधिकार है। न्यायालय ने कहा कि कृत्रिम अंग की अवधि केवल पांच वर्ष मानी जाती है और मुआवजे के लिए पीड़ित की जीवन प्रत्याशा 70 वर्ष मानी जानी चाहिए। पीठ ने बीमा कंपनी को कृत्रिम अंगों और सहाय के भरण-पोषण के लिए 26 लाख रुपये का भुगतान करने का निर्देश दिया। बीमा कंपनी को कुल 36,20,350 रुपये का भुगतान चार सप्ताह के भीतर करना होगा और भुगतान न करने पर नौ प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से ब्याज लगेगा।

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दुर्घटना पीडि़तों को अच्छी गुणवत्ता वाले कृत्रिम अंग पाने का अधिकार: सुप्रीम कोर्ट

 उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को फैसला सुनाया कि मोटर दुर्घटना पीड़ितों को अच्छी गुणवत्ता वाले कृत्रिम अंग पाने का अधिकार है, जो उनके जीवन का अभिन्न अंग है। न्यायालय ने कहा कि वे लोग जो दुर्घटना में अंग गंवा देते हैं उनके लिए ऐसे कृत्रिम अंग दिव्यांगता दूर करने का तरीका होते हैं। न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति केवी विश्वनाथन की पीठ ने कहा कि कृत्रिम अंग केवल चिकित्सा उपकरण नहीं बल्कि अंग गंवा चुके व्यक्ति के आत्मविश्वास और सशक्तीकरण का एक अनिवार्य हिस्सा है।   शीर्ष अदालत ने ‘रेस्टिट्यूटियो इन इंटीग्रम’ (वापस मूल स्थिति में आना) के कानूनी सिद्धांत का हवाला देते हुए कहा कि अंग गंवा चुके लोगों के लिए कृत्रिम अंग दिव्यांगता दूर करने का तरीका होते हैं। ऐसे उपकरण उन्हें सशक्त बनाने के अलावा, उनके जीवन का अभिन्न अंग हैं, जो उन्हें आत्मविश्वास प्रदान करता है। इसकी अनिवार्यता को केवल दिव्यांग व्यक्ति ही बेहतर ढंग से समझ सकता है। उच्चतम न्यायालय का यह फैसला प्रहलाद सहाय की अपील पर आया, जो 2007 में हरियाणा रोडवेज की बस की टक्कर से दाहिना पैर गंवा बैठे थे।दुर्घटना के समय सहाय मोटरसाइकिल पर सवार थे।   मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण (एमसीएटी) ने शुरू में उन्हें 8.73 लाख रुपये का मुआवजा दिया था, जिसे बाद में राजस्थान उच्च न्यायालय ने बढ़ाकर 13.02 लाख रुपये कर दिया था। हालांकि, उच्चतम न्यायालय ने इन राशियों को अपर्याप्त पाया।   न्यायालय ने अब बीमा कंपनी को अतिरिक्त 36.20 लाख रुपये का भुगतान करने का आदेश दिया, जिससे उनका कुल मुआवजा लगभग 50 लाख रुपये हो गया है। न्यायालय ने बीमा कंपनी की इस दलील को खारिज कर दिया गया कि पीड़ितों को केवल सरकारी अधिसूचनाओं के आधार पर ही मुआवजा दिया जाना चाहिए।  पीठ ने कहा, बीमा कंपनी द्वारा उद्धृत सरकारी अधिसूचना में निर्धारित दरें, जो किसी भी स्थिति में बेहद कम हैं, उन्हें अस्वीकार करने में हमें कोई संकोच नहीं है। पीठ ने यह भी कहा कि पीड़ितों को अपनी व्यक्तिगत आवश्यकताओं के अनुरूप उपकरण उपलब्ध कराने वाले निजी केंद्रों को चुनने का अधिकार है। न्यायालय ने कहा कि कृत्रिम अंग की अवधि केवल पांच वर्ष मानी जाती है और मुआवजे के लिए पीड़ित की जीवन प्रत्याशा 70 वर्ष मानी जानी चाहिए। पीठ ने बीमा कंपनी को कृत्रिम अंगों और सहाय के भरण-पोषण के लिए 26 लाख रुपये का भुगतान करने का निर्देश दिया। बीमा कंपनी को कुल 36,20,350 रुपये का भुगतान चार सप्ताह के भीतर करना होगा और भुगतान न करने पर नौ प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से ब्याज लगेगा।


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