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20-04-2026

भारत को ग्लोबल मेन्यूफेक्चरिंग हब बनाने में आडे आ रहीं ये समस्याएं, सीआईआई ने सरकार को दिए सुझाव

  •  देश में मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को रफ्तार देने के लिए उद्योग संगठन भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) ने औद्योगिक भूमि प्रबंधन में बड़े सुधारों की जरूरत बताई है। सीआईआई ने अपनी रिपोर्ट ‘सीआईआई भूमि मिशन: भारत में औद्योगिक भूमि प्रबंधन में सुधार हेतु एक रूपरेखा’ जारी करते हुए कहा कि अगर भारत को वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग हब बनना है तो औद्योगिक जमीन की उपलब्धता को आसान, पारदर्शी और तेज बनाना बेहद जरूरी है। इस रिपोर्ट को सीआईआई के पूर्व अध्यक्ष टीवी नरेंद्रन के नेतृत्व में तैयार किया गया है। इसे बनाने के लिए विभिन्न उद्योग क्षेत्रों के विशेषज्ञों और हितधारकों से व्यापक बातचीत की गई, ताकि जमीनी स्तर की समस्याओं और उनके व्यावहारिक समाधान सामने आ सकें। रिपोर्ट में कहा गया है कि औद्योगिक जमीन मैन्युफैक्चरिंग, इंफ्रास्ट्रक्चर, नवीकरणीय ऊर्जा और लॉजिस्टिक्स जैसे क्षेत्रों की बुनियादी जरूरत है, लेकिन वर्तमान व्यवस्था में कई बड़ी समस्याएं हैं, जैसे प्रक्रियाओं का बिखराव, नियमों की जटिलता, जमीन के स्वामित्व (टाइटल) की अस्पष्टता, कब्जा मिलने में देरी और आवंटित जमीन का सही उपयोग न होना। इन कारणों से परियोजनाओं की लागत बढ़ती है, समय ज्यादा लगता है और निवेशकों, खासकर एमएसएमई और नई परियोजनाओं के लिए भरोसा कमजोर होता है। रिपोर्ट में जमीन से जुड़े पूरे लाइफसाइकिल का विश्लेषण किया गया है। जमीन की पहचान से लेकर आवेदन, आवंटन, भूमि उपयोग परिवर्तन (सीएलयू), सत्यापन, अधिग्रहण, कब्जा, उपयोग और संस्थागत क्षमता तक। इसमें यह भी सामने आया कि दस्तावेजों का मानकीकरण नहीं है, कई विभागों के चक्कर लगाने पड़ते हैं, समय सीमा तय नहीं है और भूमि रिकॉर्ड अधूरे हैं। सीआईआई के महानिदेशक चंद्रजीत बनर्जी ने कहा, ‘मेक इन इंडिया, नेशनल इंडस्ट्रियल कॉरिडोर, नवीकरणीय ऊर्जा और आधुनिक लॉजिस्टिक्स जैसे बड़े लक्ष्यों को तभी हासिल किया जा सकता है, जब औद्योगिक जमीन पूरी तरह तैयार, पारदर्शी और निवेश के अनुकूल हो।’ रिपोर्ट में एक बड़ा सुझाव ‘राष्ट्रीय औद्योगिक भूमि बैंक’ बनाने का है, जो जीआईएस तकनीक से जुड़ा हो और जिसमें जमीन की उपलब्धता, जोनिंग, सुविधाएं, पर्यावरणीय स्थिति और स्वामित्व की जानकारी रियल टाइम में मिले। इससे निवेशक तेजी से और सही निर्णय ले सकेंगे। इसके अलावा, एक डिजिटल सिंगल विंडो सिस्टम बनाने की सिफारिश की गई है, जिससे सभी मंजूरियां एक ही प्लेटफॉर्म पर मिल सकें। इसमें तय समयसीमा (एसएलए), रियल टाइम ट्रैकिंग और डिम्ड अप्रूवल जैसी व्यवस्था भी शामिल हो। हर आवेदन के लिए एक जिम्मेदार अधिकारी (केस ओनर) तय करने की भी बात कही गई है। 

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भारत को ग्लोबल मेन्यूफेक्चरिंग हब बनाने में आडे आ रहीं ये समस्याएं, सीआईआई ने सरकार को दिए सुझाव

 देश में मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को रफ्तार देने के लिए उद्योग संगठन भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) ने औद्योगिक भूमि प्रबंधन में बड़े सुधारों की जरूरत बताई है। सीआईआई ने अपनी रिपोर्ट ‘सीआईआई भूमि मिशन: भारत में औद्योगिक भूमि प्रबंधन में सुधार हेतु एक रूपरेखा’ जारी करते हुए कहा कि अगर भारत को वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग हब बनना है तो औद्योगिक जमीन की उपलब्धता को आसान, पारदर्शी और तेज बनाना बेहद जरूरी है। इस रिपोर्ट को सीआईआई के पूर्व अध्यक्ष टीवी नरेंद्रन के नेतृत्व में तैयार किया गया है। इसे बनाने के लिए विभिन्न उद्योग क्षेत्रों के विशेषज्ञों और हितधारकों से व्यापक बातचीत की गई, ताकि जमीनी स्तर की समस्याओं और उनके व्यावहारिक समाधान सामने आ सकें। रिपोर्ट में कहा गया है कि औद्योगिक जमीन मैन्युफैक्चरिंग, इंफ्रास्ट्रक्चर, नवीकरणीय ऊर्जा और लॉजिस्टिक्स जैसे क्षेत्रों की बुनियादी जरूरत है, लेकिन वर्तमान व्यवस्था में कई बड़ी समस्याएं हैं, जैसे प्रक्रियाओं का बिखराव, नियमों की जटिलता, जमीन के स्वामित्व (टाइटल) की अस्पष्टता, कब्जा मिलने में देरी और आवंटित जमीन का सही उपयोग न होना। इन कारणों से परियोजनाओं की लागत बढ़ती है, समय ज्यादा लगता है और निवेशकों, खासकर एमएसएमई और नई परियोजनाओं के लिए भरोसा कमजोर होता है। रिपोर्ट में जमीन से जुड़े पूरे लाइफसाइकिल का विश्लेषण किया गया है। जमीन की पहचान से लेकर आवेदन, आवंटन, भूमि उपयोग परिवर्तन (सीएलयू), सत्यापन, अधिग्रहण, कब्जा, उपयोग और संस्थागत क्षमता तक। इसमें यह भी सामने आया कि दस्तावेजों का मानकीकरण नहीं है, कई विभागों के चक्कर लगाने पड़ते हैं, समय सीमा तय नहीं है और भूमि रिकॉर्ड अधूरे हैं। सीआईआई के महानिदेशक चंद्रजीत बनर्जी ने कहा, ‘मेक इन इंडिया, नेशनल इंडस्ट्रियल कॉरिडोर, नवीकरणीय ऊर्जा और आधुनिक लॉजिस्टिक्स जैसे बड़े लक्ष्यों को तभी हासिल किया जा सकता है, जब औद्योगिक जमीन पूरी तरह तैयार, पारदर्शी और निवेश के अनुकूल हो।’ रिपोर्ट में एक बड़ा सुझाव ‘राष्ट्रीय औद्योगिक भूमि बैंक’ बनाने का है, जो जीआईएस तकनीक से जुड़ा हो और जिसमें जमीन की उपलब्धता, जोनिंग, सुविधाएं, पर्यावरणीय स्थिति और स्वामित्व की जानकारी रियल टाइम में मिले। इससे निवेशक तेजी से और सही निर्णय ले सकेंगे। इसके अलावा, एक डिजिटल सिंगल विंडो सिस्टम बनाने की सिफारिश की गई है, जिससे सभी मंजूरियां एक ही प्लेटफॉर्म पर मिल सकें। इसमें तय समयसीमा (एसएलए), रियल टाइम ट्रैकिंग और डिम्ड अप्रूवल जैसी व्यवस्था भी शामिल हो। हर आवेदन के लिए एक जिम्मेदार अधिकारी (केस ओनर) तय करने की भी बात कही गई है। 


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