एक्सपोर्टर्स के संगठन फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट ऑर्गनाइजेशंस (फियो) ने कहा कि भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के रेपो दर बढ़ाए जाने से एक्सपोर्टर्स, खासकर छोटे और मझोले कारोबारियों (एमएसएमई), पर डेब्ट का बोझ बढ़ सकता है। संगठन ने कहा कि यह स्थिति ऐसे समय आई है जब वैश्विक व्यापार पहले से ही कई अनिश्चितताओं का सामना कर रहा है। आरबीआई ने बुधवार को रेपो दर में 0.25 प्रतिशत की बढ़ोतरी कर इसे 5.50 प्रतिशत कर दिया। फियो के अध्यक्ष एससी रल्हन ने कहा कि बढ़ती महंगाई और कीमतों को नियंत्रण में रखने की जरूरत को देखते हुए आरबीआई का रेपो दर बढ़ाने का फैसला समझ में आता है। हालांकि, ब्याज दरों में बढ़ोतरी से निर्यात पर निर्भर कारोबारों के लिए रोजमर्रा के खर्च और कारोबार चलाने के लिए जरूरी पूंजी जुटाना महंगा हो जाता है। इसका असर खासकर एमएसएमई पर पड़ सकता है। निर्यातक इस समय बेहद अनिश्चित वैश्विक परिस्थितियों में कारोबार कर रहे हैं। भू-राजनीतिक तनाव, ऊर्जा की कीमतों में उतार-चढ़ाव, आपूर्ति श्रृंखला में रुकावट, माल पहुंचने में अधिक समय और भुगतान में देरी के कारण निर्यात कारोबार में पैसा लंबे समय तक फंसा रहता है। रल्हन ने कहा कि ऐसे समय में डेब्ट पर अधिक ब्याज देना भारतीय एक्सपोर्टर्स की प्रतिस्पर्धा क्षमता को प्रभावित कर सकता है, खासकर उन कंपनियों को जिनका मुनाफा पहले ही कम है। उन्होंने आरबीआई से एक्सपोर्टर्स को अधिक समय तक डेब्ट सुविधा देने का आग्रह किया। फियो ने कहा कि निर्यात से पहले और निर्यात के बाद मिलने वाले डेब्ट की मौजूदा 270 दिन की अवधि बढ़ाकर 450 दिन की जानी चाहिए। संगठन के अनुसार, लंबे समय तक चलने वाली समुद्री यात्रा, माल ढुलाई में रुकावट और निर्यात भुगतान मिलने में देरी के कारण एक्सपोर्टर्स को अतिरिक्त समय की जरूरत है। रल्हन ने कहा कि डेब्ट की अवधि बढ़ाने से एक्सपोर्टर्स को वित्तीय दबाव से राहत मिलेगी और वे विदेशी ग्राहकों के साथ किए गए अपने कारोबारी वादे पूरे कर सकेंगे। फियो ने यह भी सुझाव दिया कि आरबीआई की सख्त मौद्रिक नीति के साथ एक्सपोर्टर्स के लिए लक्षित नकदी सहायता और सस्ता डेब्ट पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध कराया जाना चाहिए। रल्हन ने कहा कि इससे निर्यातक बढ़ी हुई उत्पादन और वित्तीय कॉस्ट का सामना करते हुए उत्पादन जारी रख सकेंगे, विदेशी ऑर्डर पूरे कर सकेंगे और नए बाजारों में कारोबार बढ़ा सकेंगे। उन्होंने कहा कि महंगाई के बढ़ते दबाव को देखते हुए आरबीआई का मौद्रिक नीति रुख सख्त करना समझ में आता है, लेकिन वैश्विक व्यापार में बढ़ती अनिश्चितता के बीच ब्याज दरों में वृद्धि से एक्सपोर्टर्स, विशेषकर एमएसएमई, पर पडऩे वाले वित्तीय बोझ को भी ध्यान में रखना चाहिए।