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08-04-2026

लिपिस्टक बेचने से नहीं बनेगा ‘विकसित भारत’

  •  याद होगा...कैसे स्टार्टअप्स के फाउंडर कॉमर्स मिनिस्टर पीयूष गोयल के पीछे पड़ गए थे। कारण...उन्होंने कहा...स्टार्टअप रियल वेल्यू नहीं बल्कि लो स्किल डिलिवरी ब्वॉय क्रिएट कर रहे हैं। बात गलत नहीं है लेकिन देश में ऐसे हाईटेक स्टार्टअप भी काम कर रहे हैं जिनकी चर्चा नहीं होती। जैसे स्पेस और डिफेंस सैक्टर में कोई 200 स्टार्टअप टेक्नोलॉजी के गैप को फिल करने की कोशिश में लगे हैं। एक जाने-माने इंवेस्टर शंकर शर्मा ने एक पोस्ट कर नई बहस छेड़ दी है। वे कहते हैं पिछले डेढ़ साल में भारतीय शेयर बाजार की परफॉर्मेन्स कमजोर रही है कंपनियों के वैल्यूएशन अरबों डॉलर घट गए। ईरान वॉर शुरू होने के बाद से विदेशी निवेशक भारत से पैसा निकाल रहे हैं। कारण एआई वेल्यू चेन भारत में नहीं के बराबर है। और यह पैसा साउथ कोरिया जैसे एआई दिग्गज मार्केट में लगाया जा रहा है। भारत में शेयरों के वेल्यूएशन अनरिअलिस्टिक (बहुत ज्यादा) हैं और नई बहस शुरू हो गई है कि क्या भारतीय शेयर बाजार एक बबल में है? वे कहते हैं ईरान जैसा देश 30 साल की पाबंदियों के बावजूद मिसाइल, ड्रोन और इंफ्रारेड ट्रैकिंग जैसी टेक्नोलॉजी के दम पर अमेरिका और इजराइल की खबर ले रहा है। शंकर शर्मा कहते हैं ईरान ऐसा इसलिए कर पा रहा है क्योंकि उसके पास भारत की तरह शेयर मार्केट नहीं है। उसके इंजीनियर असली प्रोडक्ट बनाते हैं, न कि 500 गुना पीई (प्राइस-टू-अर्निंग) पर फूड और लिपस्टिक एप। उन्होंने कहा कि भारत की असली ग्रोथ तब शुरू होगी जब भारत में 5-10 साल का बेयर (कमजोर) मार्केट आएगा और लोग इन फालतू (फ्लफ) बिजनेस की बजाय असली बिलियन डॉलर मार्केट कैप वाले बिजनेस बनाने पर ध्यान देंगे। मोडेक्स कंप्यूटर्स के फाउंडर सार्थक शर्मा कहते हैं कि धाकड़ इकोनॉमी बनने के लिए कंजम्प्शन-आधारित कंपनियों और प्रोडक्ट -आधारित कंपनियों के बीच बैलेंस जरूरी है। पिछले दशक में कंज्यूमर-फोकस्ड स्टार्टअप्स की बाढ़ आई है जिनसे कैपिटल इंवेस्टमेंट भटक सकता है। मैन्युफैक्चरिंग, इंडस्ट्रियल डवलपमेंट और इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे बेसिक सेक्टर इकोनॉमी की बैकबोन यानी रीढ़ की हड्डी होते हैं। वल्र्ड ऑफ सर्कुलर इकोनॉमी की पल्लवी धौंडियाल पंथरी के अनुसार लंबे बुल मार्केट में सरप्लस लिक्विडिटी और इंवेस्टर रिस्क कम होने से इंवेस्टमेंट, खासकर कंज्यूमर टेक और डिजिटल स्पेस में जाता है जहां वैल्यूएशन ज्यादा और एंट्री आसान होती है। ये कंपनियां तेजी से स्केल और रिटर्न देती हैं। लेकिन करेक्शन के मार्केट में निवेशक प्रॉफिटेबिलिटी और स्थिरता जैसे व्यावहारिक पहलुओं पर ध्यान देते हैं। ऐसे समय में इंवेस्टमेंट मैन्युफैक्चरिंग, डीप टेक और इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे सेक्टरों में जाता है जिनमें लॉन्ग टर्म वेल्यू क्रिएशन होता है, इनोवेशन होता है और इकोनॉमी के बेस का विस्तार होता है।

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लिपिस्टक बेचने से नहीं बनेगा ‘विकसित भारत’

 याद होगा...कैसे स्टार्टअप्स के फाउंडर कॉमर्स मिनिस्टर पीयूष गोयल के पीछे पड़ गए थे। कारण...उन्होंने कहा...स्टार्टअप रियल वेल्यू नहीं बल्कि लो स्किल डिलिवरी ब्वॉय क्रिएट कर रहे हैं। बात गलत नहीं है लेकिन देश में ऐसे हाईटेक स्टार्टअप भी काम कर रहे हैं जिनकी चर्चा नहीं होती। जैसे स्पेस और डिफेंस सैक्टर में कोई 200 स्टार्टअप टेक्नोलॉजी के गैप को फिल करने की कोशिश में लगे हैं। एक जाने-माने इंवेस्टर शंकर शर्मा ने एक पोस्ट कर नई बहस छेड़ दी है। वे कहते हैं पिछले डेढ़ साल में भारतीय शेयर बाजार की परफॉर्मेन्स कमजोर रही है कंपनियों के वैल्यूएशन अरबों डॉलर घट गए। ईरान वॉर शुरू होने के बाद से विदेशी निवेशक भारत से पैसा निकाल रहे हैं। कारण एआई वेल्यू चेन भारत में नहीं के बराबर है। और यह पैसा साउथ कोरिया जैसे एआई दिग्गज मार्केट में लगाया जा रहा है। भारत में शेयरों के वेल्यूएशन अनरिअलिस्टिक (बहुत ज्यादा) हैं और नई बहस शुरू हो गई है कि क्या भारतीय शेयर बाजार एक बबल में है? वे कहते हैं ईरान जैसा देश 30 साल की पाबंदियों के बावजूद मिसाइल, ड्रोन और इंफ्रारेड ट्रैकिंग जैसी टेक्नोलॉजी के दम पर अमेरिका और इजराइल की खबर ले रहा है। शंकर शर्मा कहते हैं ईरान ऐसा इसलिए कर पा रहा है क्योंकि उसके पास भारत की तरह शेयर मार्केट नहीं है। उसके इंजीनियर असली प्रोडक्ट बनाते हैं, न कि 500 गुना पीई (प्राइस-टू-अर्निंग) पर फूड और लिपस्टिक एप। उन्होंने कहा कि भारत की असली ग्रोथ तब शुरू होगी जब भारत में 5-10 साल का बेयर (कमजोर) मार्केट आएगा और लोग इन फालतू (फ्लफ) बिजनेस की बजाय असली बिलियन डॉलर मार्केट कैप वाले बिजनेस बनाने पर ध्यान देंगे। मोडेक्स कंप्यूटर्स के फाउंडर सार्थक शर्मा कहते हैं कि धाकड़ इकोनॉमी बनने के लिए कंजम्प्शन-आधारित कंपनियों और प्रोडक्ट -आधारित कंपनियों के बीच बैलेंस जरूरी है। पिछले दशक में कंज्यूमर-फोकस्ड स्टार्टअप्स की बाढ़ आई है जिनसे कैपिटल इंवेस्टमेंट भटक सकता है। मैन्युफैक्चरिंग, इंडस्ट्रियल डवलपमेंट और इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे बेसिक सेक्टर इकोनॉमी की बैकबोन यानी रीढ़ की हड्डी होते हैं। वल्र्ड ऑफ सर्कुलर इकोनॉमी की पल्लवी धौंडियाल पंथरी के अनुसार लंबे बुल मार्केट में सरप्लस लिक्विडिटी और इंवेस्टर रिस्क कम होने से इंवेस्टमेंट, खासकर कंज्यूमर टेक और डिजिटल स्पेस में जाता है जहां वैल्यूएशन ज्यादा और एंट्री आसान होती है। ये कंपनियां तेजी से स्केल और रिटर्न देती हैं। लेकिन करेक्शन के मार्केट में निवेशक प्रॉफिटेबिलिटी और स्थिरता जैसे व्यावहारिक पहलुओं पर ध्यान देते हैं। ऐसे समय में इंवेस्टमेंट मैन्युफैक्चरिंग, डीप टेक और इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे सेक्टरों में जाता है जिनमें लॉन्ग टर्म वेल्यू क्रिएशन होता है, इनोवेशन होता है और इकोनॉमी के बेस का विस्तार होता है।


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