TOP

ई - पेपर Subscribe Now!

ePaper
Subscribe Now!

Download
Android Mobile App

Daily Business Newspaper | A Knowledge Powerhouse in Hindi

06-04-2026

चाय की केतली मिटा रही चीन की चिंता?

  •  ग्लोबल डिमांड का 20 परसेंट तेल और गैस स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरती है। लेकिन इसकी नाकेबंदी के चलते भारत, सहित दक्षिण एशिया, आसियान और पूर्वी एशिया के देशों की सप्लाई लाइन को अस्त-व्यस्त कर दिया है। एशिया के कई देशों को तेल महंगा करना पड़ा है और वर्क फ्रॉम होम जैसे कई कदम उठाने पड़े हैं। कई देश सुरक्षित मार्ग के लिए ईरान से समझौते करने में जुटे हैं। चीन का भी आधे से अधिक तेल खाड़ी के देशों से आता है। यहां तक कि ईरान द्वारा पिछले साल एक्सपोर्ट किया गया 80 परसेंट तेल चीन ने ही खरीदा था। लेकिन इस ग्लोबल क्राइसिस में भी चीन में किसी पैनिक की कोई खबर नहीं आ रही है। चीन दरअसल सालों से छोटी-छोटी रिफाइनरी लगाने की एक स्ट्रेटेजी पर चल रहा था। इन्हें चाय की केतली जैसी आकार के कारण टीपॉट रिफाइनरी कहते हैं। ये रिफाइनरी छोटी होती है और प्राइवेट होती हैं। इनमें से ज्यादातर रिफाइनरी चीन के शानदोंग प्रांत में स्थित हैं। चीन की कुल प्रोसेसिंग कैपेसिटी में इनका शेयर 25 परसेंट है। बहुत कम मुनाफे पर काम करने वाली ये रिफाइनरी ज्यादातर प्रतिबंध वाले देश जैसे ईरान, रूस और वेनेजुएला आदि देशों से भारी डिस्काउंट पर गुपचुप तेल खरीदती और उसे स्टॉक कर रखती हैं। चीन ने शुरुआती 2026 तक लगभग 1.2 बिलियन बैरल का स्ट्रेटेजिक ऑइल रिजर्व बना लिया, जो उसके समुद्री आयात के लगभग 109 दिनों के बराबर है। यह तेल चीन ने बहुत बड़े डिस्काउंट पर खरीदा था। हालांकि एनर्जी डेटा एनेलिटिक्स फर्म कैप्सल की एनेलिस्ट मुयू शू के अनुसार, यह सुरक्षा कवच धीरे-धीरे कम हो रहा है। मार्च में चीन का समुद्री कच्चा तेल इंपोर्ट घटकर 10.19 मिलियन बैरल प्रति दिन रह गया, जो फरवरी में 11.51 मिलियन था। मार्च में आने वाला अधिकांश तेल युद्ध से पहले लोड किया गया था, और अप्रैल में इंपोर्ट में तेज गिरावट आ सकती है। टीपॉट रिफाइनर अब हाई प्राइस और कम मार्जिन के कारण नया स्टॉक नहीं खरीद रहे हैं। जब तेल महंगा हो जाता है, तो ये छोटी रिफाइनरी खरीद नहीं कर पातीं। 2026 के पहले दो महीनों में रूस से चीन को कच्चे तेल की सप्लाई 40.9 परसेंट बढ़ गई।

Share
चाय की केतली मिटा रही चीन की चिंता?

 ग्लोबल डिमांड का 20 परसेंट तेल और गैस स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरती है। लेकिन इसकी नाकेबंदी के चलते भारत, सहित दक्षिण एशिया, आसियान और पूर्वी एशिया के देशों की सप्लाई लाइन को अस्त-व्यस्त कर दिया है। एशिया के कई देशों को तेल महंगा करना पड़ा है और वर्क फ्रॉम होम जैसे कई कदम उठाने पड़े हैं। कई देश सुरक्षित मार्ग के लिए ईरान से समझौते करने में जुटे हैं। चीन का भी आधे से अधिक तेल खाड़ी के देशों से आता है। यहां तक कि ईरान द्वारा पिछले साल एक्सपोर्ट किया गया 80 परसेंट तेल चीन ने ही खरीदा था। लेकिन इस ग्लोबल क्राइसिस में भी चीन में किसी पैनिक की कोई खबर नहीं आ रही है। चीन दरअसल सालों से छोटी-छोटी रिफाइनरी लगाने की एक स्ट्रेटेजी पर चल रहा था। इन्हें चाय की केतली जैसी आकार के कारण टीपॉट रिफाइनरी कहते हैं। ये रिफाइनरी छोटी होती है और प्राइवेट होती हैं। इनमें से ज्यादातर रिफाइनरी चीन के शानदोंग प्रांत में स्थित हैं। चीन की कुल प्रोसेसिंग कैपेसिटी में इनका शेयर 25 परसेंट है। बहुत कम मुनाफे पर काम करने वाली ये रिफाइनरी ज्यादातर प्रतिबंध वाले देश जैसे ईरान, रूस और वेनेजुएला आदि देशों से भारी डिस्काउंट पर गुपचुप तेल खरीदती और उसे स्टॉक कर रखती हैं। चीन ने शुरुआती 2026 तक लगभग 1.2 बिलियन बैरल का स्ट्रेटेजिक ऑइल रिजर्व बना लिया, जो उसके समुद्री आयात के लगभग 109 दिनों के बराबर है। यह तेल चीन ने बहुत बड़े डिस्काउंट पर खरीदा था। हालांकि एनर्जी डेटा एनेलिटिक्स फर्म कैप्सल की एनेलिस्ट मुयू शू के अनुसार, यह सुरक्षा कवच धीरे-धीरे कम हो रहा है। मार्च में चीन का समुद्री कच्चा तेल इंपोर्ट घटकर 10.19 मिलियन बैरल प्रति दिन रह गया, जो फरवरी में 11.51 मिलियन था। मार्च में आने वाला अधिकांश तेल युद्ध से पहले लोड किया गया था, और अप्रैल में इंपोर्ट में तेज गिरावट आ सकती है। टीपॉट रिफाइनर अब हाई प्राइस और कम मार्जिन के कारण नया स्टॉक नहीं खरीद रहे हैं। जब तेल महंगा हो जाता है, तो ये छोटी रिफाइनरी खरीद नहीं कर पातीं। 2026 के पहले दो महीनों में रूस से चीन को कच्चे तेल की सप्लाई 40.9 परसेंट बढ़ गई।


Label

PREMIUM

CONNECT WITH US

X
Login
X

Login

X

Click here to make payment and subscribe
X

Please subscribe to view this section.

X

Please become paid subscriber to read complete news