अमेरिका में हिंदुस्तानियों के खिलाफ हेट क्राइम की खबरें तो अपनी जगह हैं जब से प्रेसिडेंट डोनाल्ड ट्रंप आए हैं कंपनियां नौकरी देने से भी बच रही हैं। यूरोप में अपॉर्चुनिटी और प्रीमियम दोनों अमेरिका से कम हैं। अब जब डॉलर के मुकाबले रुपया 96 तक फिसल चुका है और आगे के कई महीने रुपये को राहत मिलने की उम्मीद कम है ऐसे में सरकार एक बार फिर मोनोपॉली एक्सपोर्ट पर दांव लगा रही है। ईरान वॉर के कारण भारत का करंट अकाउंट डेफिसिट वित्त वर्ष26 के 0.9 परसेंट से बढक़र वित्त वर्ष27 में जीडीपी के 2.3 परसेंट तक पहुंचने का अनुमान है। इस साल लागू हो रहे नए एफटीए से गुड्स और सर्विसेस एक्सपोर्ट नई ग्रोथ अनलॉक होगी साथ ही सरकार भारत के ऐसे मोनोपॉली एक्सपोर्ट पर दांव बढ़ा रही है जो बिग बिलियन की कमाई देता है और क्राइसिस के दिनों में सेफ्टी कवर बन जाता है। यह कुछ और नहीं बल्कि ह्यूमन रिसोर्स यानी मानव संसाधन यानी वर्कफोर्स है। भारत सरकार अब रेमिटेंस इनकम बढ़ाने के लिए ह्यूमन रिसोर्स एक्सपोर्ट को फास्टग्रोथ के रास्ते पर डालने की तैयारी में है। विदेश मंत्रालय ने स्किल डवलपमेंट मिनिस्ट्री को इजराइल के लिए स्किल्ड लेबर की तैनाती फास्ट्रेक करने को कहा है। सरकार युवा आबादी को एक ऑर्गेनाइज्ड ग्लोबल मैनपावर में डॉलर का स्थायी जरिया बनाना चाहती है। साथ में लगी टेबल के अनुसार वित्त वर्ष 2015 में भारत का ट्रेड डेफिसिट 138 बिलियन डॉलर से बढक़र वित्त वर्ष 2026 में 300 बिलियन डॉलर हो गया। और...इन्हीं सालों में भारत की रेमिटेंस इनकम 69 बिलियन डॉलर से बढक़र 138 बिलियन डॉलर हो गई। यानी जिस तेजी से भारत का ट्रेड डेफिसिट बढ़ा है करीब-करीब उतनी ही तेजी से रेमिटेंस इनकम भी बढ़ी है। दूसरी ओर वित्त वर्ष 26 में भारत में कुल एफडीआई केवल 88 बिलियन डॉलर रहा। हालांकि अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा और यूरोप जैसे पसंदीदा देशों में वीजा नियम सख्त हो रहे हैं और राजनीतिक दबावों के कारण प्रवासी कर्मचारियों का कोटा भी घट रहा है। लेकिन जापान, रूस, इजराइल और खाड़ी के देशों में स्किल्ड मैनपावर का भारी क्राइसिस इंडिया के लिए बड़ी अपॉर्चुनिटी है। ऐसे में ओवरसीज मोबिलिटी बिल के जरिए सरकार 1983 के प्रवासन कानून को बदल रही है। जिससे सुरक्षित प्लेसमेंट, उचित वेतन, कानूनी सुरक्षा और विदेश से लौटने वाले श्रमिकों के पुनर्वास के सिस्टम को अपग्रेड किया जाएगा। अभी हाल ही इजराइल ने 5 साल में 50 साल में इंडियन स्किल्ड वर्कर लेने का समझौता किया है। इसके लिए योग्य कैंडिडेट शॉर्टलिस्ट करने की जिम्मेदारी खुद नेशनल स्किल डवलपमेंट कॉर्पोरेशन ने अपने हाथ में ले ली है। रूस और जापान में वर्कफोर्स की कमी को देखते हुए इन्होंने भारत के साथ मैनपावर के लिए एग्रीमेंट किए हैं। रूस में 2030 तक 31 लाख कर्मचारियों की कमी होगी। अकेले मैन्युफैक्चरिंग में ही 8 लाख लोगों की कमी। जापान ने भारत से पांच साल में पांच लाख मैनपावर लेने के लिए एग्रीमेंट किया है। जापान की हॉस्पिटेलिटी, हेल्थकेयर, मैन्युफैक्चरिंग और केयरगिविंग इंडस्ट्री में कर्मचारियों की भारी कमी है।
