क्या अपने कभी सोचा है कि सरकार की तमाम योजनाओं, कोशिशों व वादों के बावजूद महंगाई या लोगों के खर्चे कम होने की बजाए लगातार बढ़ते क्यों जाते हैं। इस पर आप विचार करें व यह पता लगाने का प्रयास करें कि आम आदमी चाहे कितना भी कमा ले पर बचत करने की उसकी क्षमता लगातार घटती क्यों जा रही है। इसके वैसे तो कई कारण है पर सबसे बड़ा रोल लाइफस्टाइल को अपग्रेड यानि ऊंचा उठाने की उस भूख का है जो कभी भी शांत होने का नाम नहीं लेती। जब इनकम का बड़ा हिस्सा स्नद्ब3द्गस्र खर्चों के नाम हो जाता है तो इनकम चाहे कितनी भी हो वह कम ही लगने लगती है। उपरोक्त स्थिति दिल्ली, मुम्बई जैसे बड़े शहरों में रहकर करोड़ों कमाने वालों के साथ मीडिल क्लास व इससे नीचे की कैटेगरी वाले लोगों में एक जैसी है जो लाइफस्टाइल को बेहतर करते रहने की कभी न खत्म होने वाली रेस का हिस्सा बन चुके हैं जिसमें रूकना या बाहर हो जाना किसी को मंजूर नहीं है भले ही इसके लिए कुछ भी करना पड़े। बड़े पैकेज पर काम कर रहे लोग हमेशा बिजी ही रहते हैं या दिखते हैं क्योंकि उनका काम उनसे लगातार ट्रेवल करने, निर्णय लेने व समस्याओं से घिरे रहकर उनका समाधान ढूंढते रहने की डिमांड करता है। इसके अलावा परिवार की जिम्मेदारियां व अन्य कामों के बीच अपनी बचत को सही काम पर लगाने के लिए जितना दिमाग व टाइम चाहिए वह नहीं मिल पाता। इसलिए ऐसे लोग अपनी बचत को इंवेस्ट करने का निर्णय फाइनेंशियल एक्सपर्टो पर छोड़ देते हैं या इधर-उधर से मिलने वाली राय पर भरोसा करने लगते हैं। कई बार बचत या एक्स्ट्रा इनकम लाइफस्टाइल से जुड़े कामों पर खर्च हो जाती है यानि बचत को संभालने व उसे कई गुना करने में ऊंची इनकम वाले लोग भी परेशानी का सामना कर रहे हैं। ज्यादातर लोग इस गलतफहमी में भी रहने लगे है कि जीवन के पीक पर जो कमाई होती है वह हमेशा वैसी ही बनी रहेगी यानि हर महीने सैलेरी का फ्लो एक जैसा बना रहेगा। यह मानकर खर्चे उसी हिसाब से होने लगते हैं व ईएमआई पर कई ऐसी खरीद के निर्णय लिए जाने लगते हैं जो वैसे ले पाना लगभग नामुमकिन ही होता है। इस स्थिति में लोगों में सुरक्षा का अहसास सबसे ज्यादा रहता है जो मानकर चलने लगते हैं कि जीवन हमेशा ऐसे ही अच्छी कमाई के साथ आगे बढ़ता जाएगा। पर हकीकत में ज्यादातर लोगों का कॅरियर एक ही दिशा में आगे नहीं बढ़ पाता और इसका अहसास तब होता है जब छंटनी का दौर चलता है, कारोबारी गतिविधियां धीरे होने लगती है व हेल्थ से संबंधित समस्याएं आने गलती है।
समझने की बात यह है कि ‘कम्फर्ट’ के भुलावे में कई लोग अपने पीक पर आसानी से आ जाते है जिसे बनाए रखना समय निकलने के साथ बड़ा चैलेंज बनता जाता है। लाइफस्टाइल के मामले में यह कड़वा सच है कि आजकल यह कमाई को नष्ट (Destroy) करने का सबसे आसान तरीका बन गई है और खर्चा करने की बीमारी ने सभी को अपनी चपेट में ले लिया है। खर्चे हमेशा बढ़ते ही रहते है और हर बार ज्यादा कमाई होने पर किसी न किसी तरह से लाइफस्टाइल को बेहतर करना ही एकमात्र जरूरी टारगेट बन जाता है। बड़ा घर, बड़ी कार, फॉरेन ट्रेवल, महंगी एज्युकेशन जैसे काम आसान व पहुंच में लगने लगते है पर यह ध्यान रखना भी जरूरी है कि एक बार इस रास्ते पर आगे बढऩे के बाद पीछे लौटना लगभग नामुमकिन ही होता है। लाइफस्टाइल के खर्चे इंवेस्ट करने की क्षमता को लगातार कम करते जाते है और जो बचत पहले से है उसे भी खर्च करने के लिए उकसाते रहते है। इस स्थिति में घिर चुके लोग भले ही कितना भी कमाएं पर उनका बड़ी वेल्थ बनाने का आधार चुपचाप व धीरे-धीरे कमजोर होता चला जाता है। लाइफस्टाइल से जुड़े महंगे प्रोडक्ट या तुरंत सुकुन देने वाले कई निर्णय जिनमें बड़ा खर्च होता है, वास्तव में व्यक्ति की बचत को हिट करते हुए लम्बे समय तक चुकाते रहने के काम पर लगा देते हैं। समस्या यह है कि लोग बाजार में जो फैशन में है उसपर ज्यादा फोकस करते हुए यह भूल जाते है कि उनके लिए क्या Suitable (उपयोगी) है। अच्छी कमाई का होना अलग बात है जो वेल्थ नहीं है पर कई लोग इसी फार्मूले पर चलते है। कमाई को मैनेज करते हुए इंवेस्ट करते रहना, अपने खर्चों को सीमित रखना और ऐसे व्यवहार से बचना जिसमें हर चीज हासिल करने की भूख हो, Common Sense के हिसाब से ये ही लाइफस्टाइल के वेल्थ और इनकम पर हो रहे अटैक से सामना करने के तरीके कहे जा सकते हैं।