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20-05-2026

अब कोर्ट केस भी बन रहे हैं 'Asset Class'

  •  भारत में इंवेस्टमेंट का नया तरीका चर्चा में आ रहा है। अब निवेशक केवल शेयर बाजार, प्रॉपर्टी या स्टार्टअप्स में ही नहीं, बल्कि कोर्ट केसों में भी पैसा लगा रहे हैं। इसे Litigation Funding या Third Party Funding (TPF) कहा जाता है। इस मॉडल में निवेशक किसी कारोबारी मुकदमे की फंडिंग करते हैं और केस जीतने पर मिलने वाले मुआवजे या सेटलमेंट में हिस्सा लेते हैं। यह कारोबार शुरुआती दौर में है, लेकिन बढ़ रहा है। फाइव रिवर्स, लीगल-पे और ईएलएफ पार्टनर्स जैसी कंपनियां इस सेगमेंट में एक्टिव हैं। मुंबई की फाइव रिवर्स का 25 से 50 मिलियन डॉलर का फंड जुटाने का प्लान है। कंपनी का दावा है कि यह भारत का पहला डेडिकेटेड लिटिगेशन फंडिंग फंड हो सकता है। वहीं लीगल-पे पहले से कई मामलों में सीधे इंवेस्ट कर रही है और निवेशकों के साथ मिलकर फंडिंग मॉडल बना रही है। जब किसी कंपनी या व्यक्ति का बड़ा कारोबारी विवाद कोर्ट में चलता है, तो मुकदमे पर भारी खर्च आता है। ऐसे में लिटिगेशन फंडिंग कंपनियां केस की स्टडी करती हैं कि केस कितना मजबूत है, जीतने पर कितनी रकम मिल सकती है और सामने वाली पार्टी पेमेंट कर सकती है या नहीं। अगर केस मजबूत लगता है, तो फंडिंग कंपनी कानूनी खर्च उठाती है। कई बार केस लडऩे वाली पार्टी को एडवांस पैसा भी दिया जाता है। बदले में केस जीतने पर मिलने वाली रकम का हिस्सा निवेशकों को मिलता है। अगर पार्टी केस में हार जाती है, तो लगाया गया पैसा डूब सकता है। इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स के मुताबिक सफल मामलों में निवेशकों को 4 से 5 साल में 200-300 प्रतिशत तक रिटर्न मिल सकता है। हालांकि यह कारोबार पूरी तरह जोखिम से भरा हुआ है क्योंकि हर केस में जीत सुनिश्चित नहीं कही जा सकती। इसी वजह से कंपनियां बहुत सोच-समझकर मामलों का चयन करती हैं। भारत में ईपीसी, इंफ्रास्ट्रक्चर और सरकारी कॉन्ट्रैक्ट से जुड़े विवादों में इस तरह की फंडिंग की मांग तेजी से बढ़ रही है। कई कंपनियां मजबूत केस होने के बावजूद पैसों की कमी के कारण लंबी कानूनी लड़ाई नहीं लड़ पातीं। ऐसे में लिटिगेशन फंडिंग उनके लिए बड़ा सहारा बन रहा है। कानूनी तौर पर भी भारत में थर्ड पार्टी फंडिंग को मंजूरी मिल चुकी है। सुप्रीम कोर्ट ने 2018 के एक फैसले में कहा था कि ऐसी फंडिंग वैध है, जब तक शर्तें गलत या शोषण वाली न हों। इसके बाद इस सेक्टर में निवेशकों की दिलचस्पी तेजी से बढ़ी है। अमेरिका और दूसरे बड़े देशों में लिटिगेशन फंडिंग पहले से बड़ा कारोबार बन चुका है।

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अब कोर्ट केस भी बन रहे हैं 'Asset Class'

 भारत में इंवेस्टमेंट का नया तरीका चर्चा में आ रहा है। अब निवेशक केवल शेयर बाजार, प्रॉपर्टी या स्टार्टअप्स में ही नहीं, बल्कि कोर्ट केसों में भी पैसा लगा रहे हैं। इसे Litigation Funding या Third Party Funding (TPF) कहा जाता है। इस मॉडल में निवेशक किसी कारोबारी मुकदमे की फंडिंग करते हैं और केस जीतने पर मिलने वाले मुआवजे या सेटलमेंट में हिस्सा लेते हैं। यह कारोबार शुरुआती दौर में है, लेकिन बढ़ रहा है। फाइव रिवर्स, लीगल-पे और ईएलएफ पार्टनर्स जैसी कंपनियां इस सेगमेंट में एक्टिव हैं। मुंबई की फाइव रिवर्स का 25 से 50 मिलियन डॉलर का फंड जुटाने का प्लान है। कंपनी का दावा है कि यह भारत का पहला डेडिकेटेड लिटिगेशन फंडिंग फंड हो सकता है। वहीं लीगल-पे पहले से कई मामलों में सीधे इंवेस्ट कर रही है और निवेशकों के साथ मिलकर फंडिंग मॉडल बना रही है। जब किसी कंपनी या व्यक्ति का बड़ा कारोबारी विवाद कोर्ट में चलता है, तो मुकदमे पर भारी खर्च आता है। ऐसे में लिटिगेशन फंडिंग कंपनियां केस की स्टडी करती हैं कि केस कितना मजबूत है, जीतने पर कितनी रकम मिल सकती है और सामने वाली पार्टी पेमेंट कर सकती है या नहीं। अगर केस मजबूत लगता है, तो फंडिंग कंपनी कानूनी खर्च उठाती है। कई बार केस लडऩे वाली पार्टी को एडवांस पैसा भी दिया जाता है। बदले में केस जीतने पर मिलने वाली रकम का हिस्सा निवेशकों को मिलता है। अगर पार्टी केस में हार जाती है, तो लगाया गया पैसा डूब सकता है। इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स के मुताबिक सफल मामलों में निवेशकों को 4 से 5 साल में 200-300 प्रतिशत तक रिटर्न मिल सकता है। हालांकि यह कारोबार पूरी तरह जोखिम से भरा हुआ है क्योंकि हर केस में जीत सुनिश्चित नहीं कही जा सकती। इसी वजह से कंपनियां बहुत सोच-समझकर मामलों का चयन करती हैं। भारत में ईपीसी, इंफ्रास्ट्रक्चर और सरकारी कॉन्ट्रैक्ट से जुड़े विवादों में इस तरह की फंडिंग की मांग तेजी से बढ़ रही है। कई कंपनियां मजबूत केस होने के बावजूद पैसों की कमी के कारण लंबी कानूनी लड़ाई नहीं लड़ पातीं। ऐसे में लिटिगेशन फंडिंग उनके लिए बड़ा सहारा बन रहा है। कानूनी तौर पर भी भारत में थर्ड पार्टी फंडिंग को मंजूरी मिल चुकी है। सुप्रीम कोर्ट ने 2018 के एक फैसले में कहा था कि ऐसी फंडिंग वैध है, जब तक शर्तें गलत या शोषण वाली न हों। इसके बाद इस सेक्टर में निवेशकों की दिलचस्पी तेजी से बढ़ी है। अमेरिका और दूसरे बड़े देशों में लिटिगेशन फंडिंग पहले से बड़ा कारोबार बन चुका है।


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