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25-05-2026

कानूनी वारिसों को हिस्सा न देने से अमान्य नहीं होगी वसीयत: सुप्रीम कोर्ट

  •  सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी व्यक्ति की वसीयत केवल इस आधार पर अमान्य नहीं ठहराई जा सकती कि उसमें पत्नी, बच्चों या अन्य कानूनी वारिसों को संपत्ति में हिस्सा नहीं दिया गया है। अदालत ने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी संपत्ति का बंटवारा अपनी इच्छा के अनुसार करने का कानूनी अधिकार है और केवल प्राकृतिक या कानूनी उत्तराधिकारियों को वंचित कर देने वसीयत को संदिग्ध या अवैध नहीं ठहराया जा सकता। जस्टिस उज्जल भुइयां और जस्टिस विजय बिश्नोई की बेंच ने एक चार्टर्ड अकाउंटेंट की वसीयत से जुड़े मामले में यह फैसला सुनाया। उस व्यक्ति ने वर्ष 1983 में अपनी संपत्तियां अपनी इकलौती बहन के नाम कर दी थीं और पत्नी तथा बच्चों को कोई हिस्सा नहीं दिया था। उनके निधन के बाद परिवार के सदस्यों ने वसीयत को चुनौती दी और तर्क दिया कि प्राकृतिक वारिसों को पूरी तरह बाहर रखना स्वयं में एक संदिग्ध परिस्थिति है। सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि वसीयत का मूल उद्देश्य ही सामान्य उत्तराधिकार की व्यवस्था से अलग जाकर संपत्ति का बंटवारा करना होता है। इसलिए केवल इस कारण कि पत्नी, बच्चे या अन्य निकट संबंधियों को संपत्ति नहीं दी गई, वसीयत को अविश्वसनीय नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि वसीयत की वैधता का निर्धारण करते समय उसके प्रावधानों, वसीयत करने वाले की मंशा और उससे जुड़ी परिस्थितियों को समग्र रूप से देखना आवश्यक है। पीठ ने यह भी कहा कि यदि किसी वसीयत के साथ धोखाधड़ी, दबाव, जालसाजी, अनुचित प्रभाव या कानूनी प्रक्रिया में कमी जैसी परिस्थितियां जुड़ी हों, तभी उसकी वैधता पर प्रश्न उठाया जा सकता है। केवल कानूनी वारिसों को संपत्ति से वंचित करना ऐसा आधार नहीं है जो अपने आप वसीयत को निरस्त कर दे। मामले में अदालत ने पाया कि वसीयत स्वतंत्र इच्छा से बनाई गई थी और इसे एक गवाह की गवाही के माध्यम से विधिवत सिद्ध भी किया गया था। वसीयत में यह उल्लेख था कि वसीयतकर्ता ने अपनी पत्नी , बच्चों और अन्य रिश्तेदारों के साथ कोई अन्याय नहीं किया है तथा उन्हें पर्याप्त संसाधन पहले ही उपलब्ध करा दिए गए थे। इसलिए केवल बहन को संपत्ति देना अवैध नहीं माना जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी दोहराया कि वसीयत का रजिस्टर्ड होना अनिवार्य नहीं है। भारत में अधिकांश वसीयतें अनरजिस्टर्ड होती हैं और केवल रजिस्टर नहीं होने के आधार पर उनकी वैधता पर संदेह नहीं किया जा सकता।

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कानूनी वारिसों को हिस्सा न देने से अमान्य नहीं होगी वसीयत: सुप्रीम कोर्ट

 सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी व्यक्ति की वसीयत केवल इस आधार पर अमान्य नहीं ठहराई जा सकती कि उसमें पत्नी, बच्चों या अन्य कानूनी वारिसों को संपत्ति में हिस्सा नहीं दिया गया है। अदालत ने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी संपत्ति का बंटवारा अपनी इच्छा के अनुसार करने का कानूनी अधिकार है और केवल प्राकृतिक या कानूनी उत्तराधिकारियों को वंचित कर देने वसीयत को संदिग्ध या अवैध नहीं ठहराया जा सकता। जस्टिस उज्जल भुइयां और जस्टिस विजय बिश्नोई की बेंच ने एक चार्टर्ड अकाउंटेंट की वसीयत से जुड़े मामले में यह फैसला सुनाया। उस व्यक्ति ने वर्ष 1983 में अपनी संपत्तियां अपनी इकलौती बहन के नाम कर दी थीं और पत्नी तथा बच्चों को कोई हिस्सा नहीं दिया था। उनके निधन के बाद परिवार के सदस्यों ने वसीयत को चुनौती दी और तर्क दिया कि प्राकृतिक वारिसों को पूरी तरह बाहर रखना स्वयं में एक संदिग्ध परिस्थिति है। सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि वसीयत का मूल उद्देश्य ही सामान्य उत्तराधिकार की व्यवस्था से अलग जाकर संपत्ति का बंटवारा करना होता है। इसलिए केवल इस कारण कि पत्नी, बच्चे या अन्य निकट संबंधियों को संपत्ति नहीं दी गई, वसीयत को अविश्वसनीय नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि वसीयत की वैधता का निर्धारण करते समय उसके प्रावधानों, वसीयत करने वाले की मंशा और उससे जुड़ी परिस्थितियों को समग्र रूप से देखना आवश्यक है। पीठ ने यह भी कहा कि यदि किसी वसीयत के साथ धोखाधड़ी, दबाव, जालसाजी, अनुचित प्रभाव या कानूनी प्रक्रिया में कमी जैसी परिस्थितियां जुड़ी हों, तभी उसकी वैधता पर प्रश्न उठाया जा सकता है। केवल कानूनी वारिसों को संपत्ति से वंचित करना ऐसा आधार नहीं है जो अपने आप वसीयत को निरस्त कर दे। मामले में अदालत ने पाया कि वसीयत स्वतंत्र इच्छा से बनाई गई थी और इसे एक गवाह की गवाही के माध्यम से विधिवत सिद्ध भी किया गया था। वसीयत में यह उल्लेख था कि वसीयतकर्ता ने अपनी पत्नी , बच्चों और अन्य रिश्तेदारों के साथ कोई अन्याय नहीं किया है तथा उन्हें पर्याप्त संसाधन पहले ही उपलब्ध करा दिए गए थे। इसलिए केवल बहन को संपत्ति देना अवैध नहीं माना जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी दोहराया कि वसीयत का रजिस्टर्ड होना अनिवार्य नहीं है। भारत में अधिकांश वसीयतें अनरजिस्टर्ड होती हैं और केवल रजिस्टर नहीं होने के आधार पर उनकी वैधता पर संदेह नहीं किया जा सकता।


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