एनेलिस्ट कह रहे हैं इंडिया ने पिछले दशक में सोलर और विंड पावर पर बिलियन्स डॉलर का जो इंवेस्टमेंट किया है वो क्राइसिस में स्लिप हो रहा है। 21 मई को इंडिया ने 270.8 गीगावॉट पीक पावर का नया रिकॉर्ड बना दिया। लेकिन भयंकर गर्मी में नाइट ब्लैकआउट आम बात हो रहा है। कारण आप जानते हैं... सूर्यदेव सांझ ढलते ही ओझल हो जाते हैं और सोलर पैनल का दम निकल जाता है। दिन की भयंकर गर्मी में सोलर पैनल जो बिजली बनाते हैं उसका स्टोरेज नहीं हो पा रहा है। नतीजा डबल व्हैमी यानी दोहरी मार। एक तो बिजली बर्बाद हो गई और जरूरत के समय मिली भी नहीं। इसका एक और बहुत घातक असर है और वो ये कि सोलर पावर कंपनियों की प्रोफिटेबिलिटी घट रह रही जिससे प्रोजेक्ट फाइनेंस करने वाले बैंकों के सामने लोन डूबत का खतरा पैदा हो गया है। अब सवाल है सोलर पावर का इस्तेमाल क्यों नहीं हो पा रहा तो जबाव है ना तो एमरजेंसी इस्तेमाल के लिए स्टोरेज फैसिलिटी है और ना ही जितनी सोलर इलेक्ट्रिसिटी बन रही है उसके ट्रांसमिशन के लिए जरूरी ग्रिड कैपेसिटी है। नतीजा रात की बिजली की जरूरत ज्यादातर थर्मल यानी कोयले से बन रही बिजली से पूरी हो पा रही है। यानी स्टोरेज और ग्रिड की कमी के कारण ग्रीन एनर्जी के मामले में हम जहां से चले थे वहीं पहुंच रहे हैं। मूडी•ा रेटिंग्स और इक्रा ने कहा है ग्रिड, ट्रांसमिशन और बैटरी स्टोरेज इंफ्रास्ट्रक्चर डवलप नहीं हुआ तो भारत के ग्रीन गोल खटाई में पड़ सकते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक वित्त वर्ष26 में भारत की कुल पावर जेनरेशन कैपेसिटी में ग्रीन एनर्जी का शेयर लगभग 26 परसेंट था जो वित्त वर्ष 30 तक 38 परसेंट हो जाएगा। अगले चार वर्ष में करीब 170 गीगावॉट की नई कैपेसिटी ऑनलाइन होनी है। लेकिन एक तरह जहां प्राइवेट इंवेस्टर सोलर और विंड प्रोजेक्ट्स को बहुत तेजी से स्केलअप कर रहे हैं वहीं सरकार जरूरत के हिसाब से ग्रिड कैपेसिटी डवलप नहीं कर पा रही है। नतीजा राजस्थान सहित कई राज्यों को ग्रिड कर्टेलमेंट के लिए कहना पड़ रहा है। ग्रिड कर्टेलमेंट यानी बिजली की बर्बादी। एनेलिस्ट्स के अनुसार कोयला आधारित बिजली संयंत्रों के उलट सोलर और विंड इलेक्ट्रिसिटी लगातार उपलब्ध नहीं रहती। सूरज केवल दिन में निकलता है और हवा हमेशा नहीं चलती। यानी दोपहर में भारी मात्रा में बिजली पैदा हो सकती है। यदि एक्स्ट्रा बिजली के स्टोरेज की कैपेसिटी नहीं होगी, तो बड़ी मात्रा में बिजली बर्बाद हो जाएगी। इक्रा के अनुसार वित्त वर्ष 26 में अवॉर्ड किए गए लगभग 80 परसेंट रिन्यूएबल प्रोजेक्ट्स सोलर+स्टोरेज या फर्म एंड डिस्पैचेबल रिन्यूएबल एनर्जी मॉडल के तहत थे। इसका अर्थ है कि केवल सोलर पैनल लगाने से समस्या हल नहीं होगी। दिन में बनी बिजली को रात की डिमांड के लिए स्टोर रखना होगा। वित्त वर्ष 26 में लगभग 22 गीगावॉट बैटरी स्टोरेज कैपेसिटी अवॉर्ड की गई, लेकिन बैटरी स्टोरेज बहुत महंगा काम है। सोलर पैनल के लिए भारत चीन से इंपोर्ट घटाने पर काम कर रहा है लेकिन बैटरी स्टोरेज प्रोजेक्ट्स से तो यह मामला भी हाथ से निकल जाएगा। और क्रिटिकल मीनरल की तरह चीन ने बैटरी का एक्सपोर्ट बैन कर दिया तो?? एआई डेटा सेंटर, ईवी, रेलवे इलेक्ट्रिफिकेशन और बढ़ती एयर कंडीशनिंग की डिमांड से बिजली खपत नए रिकॉर्ड बना रही है। एनेलिस्ट कहते हैं कि भारत अब जेनरेशन लेड ग्रोथ से सिस्टम लेड ग्रोथ के दौर में प्रवेश कर चुका है। ऐसे में गीगावॉट कैपेसिटी इंस्टॉल करने से नहीं ग्रिड, स्टोरेज, ट्रांसमिशन और डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क का पूरा इकोसिस्टम बनाने की जरूरत है।
