क्या लम्बे समय तक कैश फूंककर यह माना जा सकता है कि कस्टमर को कभी न कभी कमाई करने लायक पैसा देने के तैयार कर लिया जाएगा? कारोबारी दुनिया के लोग इस ‘मॉडल’ को कितना सही मानते हैं यह तो नहीं पता पर इतना जरूर है कि फंूकने के लिए कैश की सप्लाई जब तक लगातार बनी रहती है तब तक ऐसे कारोबार हार मानने के लिए खुद को तैयार नहीं कर पाते। आजकल सभी लोग क्विक कॉमर्स यानि 10-30 मिनट में किसी भी प्रोडक्ट की डिलिवरी की सुविधा का उपयोग कर रहे हैं और यह काम जो कारोबार कर रहे हैं उन्होंने कैश फूंककर अपने लिए जगह बनाने व कभी न कभी कमाई करने की उम्मीद पर दांव लगा रखा है। सच्चाई यह है कि इस सेक्टर में कंपीटिशन अपने पीक पर है जिसके चलते डिलिवरी करके प्रोफिट कमाना किसी बड़े चैलेंज से कम नहीं है। वास्तव में क्विक कॉमर्स में होने वाला काम सिर्फ डिलिवरी तक ही सीमित नहीं है बल्कि इसके लिए सेकड़ों प्रोडक्ट का स्टॉक करना व इसके लिए सभी तरह के इंतजाम करना भी शामिल है जो इसे Inventory (स्टॉक) और प्रोपर्टी (Warehouse) से जुड़ा कारोबार भी बना देता है। आज की तारीख में Amazon जैसी बड़ी कंपनियां व बड़े इंवेस्टर भारत में क्विक कॉमर्स पर बड़ा पैसा इंवेस्ट कर रहे हैं। पिछले वर्ष भारत का क्विक कॉमर्स बाजार करीब 8 बिलियन डॉलर का रहा जिसके वर्ष 2030 तक 50 बिलियन डॉलर हो जाने का अनुमान है। अगर ऐसा हुआ तो क्विक कॉमर्स की भारत के ई-कॉमर्स सेक्टर में 20 प्रतिशत की हिस्सेदारी हो जाएगी जो आज 8 प्रतिशत के करीब है। क्विक कॉमर्स का पूरा सिस्टम शहरों में हर 2-4 कि.मी. में फैले छोटे-छोटे वेयरहाउसों पर टिका है जिन्हे Dark Store कहा जाता है। ऐसे वेयरहाउसों को ढूंढना व उन्हे तैयार करना क्विक कॉमर्स के लिए सबसे जरूरी है जिनके बिना उनका कारोबारी फार्मूला काम ही नहीं कर सकता। ये वेयरहाउस 3-10 हजार स्क्वॉयर फीट के होते हैं और इनके अलावा 3-4 लाख स्क्वॉयर फीट का बड़ा वेयरहाउस होता है जहां सभी प्रोडक्ट स्टोर किए जाते हैं। दिल्ली जैसे शहर में 200 से ज्यादा छोटे वेयरहाउस की जरूरत मानी गई है ताकि 10-30 मिनट में डिलिवरी संभव हो सके। इन छोटे वेयरहाउसों में दिन में कई बार स्टॉक को बनाए रखने के लिए बड़े वेयरहाउस से सप्लाई होती है।
भारत में ऐसे करीब 6 हजार छोटे वेयरहाउस अभी मौजूद है जिनमें से 70 प्रतिशत वेयरहाउस बड़ी 5 कंपनियों के है। Mindset के 2200 से ज्यादा वेयरहाउस पूरे देश में फैले है। कई जगहों पर तो Experience ऑर्डर पर एम्बुलेंस की सुविधा भी दे रही है। Experience भारत के 100 शहरों में क्विक डिलिवरी की सुविधा देने के प्लान पर काम कर रहा है जिसके लिए 1000 से ज्यादा छोटे वेयरहाउस खोले जाएंगे।कारोबारी नजरिए से क्विक कॉमर्स की इकोनोमिक्स को समझना मुश्किल है पर संभावना यह है कि यह काम धीरे-धीरे 2-3 प्लेयरों तक सिमट कर रह जाएगा जैसा स्टार्टअप इकोसिस्टम में होता आया है। इसका सबसे बड़ा कारण है कस्टमर की मानसिकता (Mindset) है जो डिस्काउंट व ऑफर की तलाश में लगातार प्लेटफॉर्म बदलते रहते हैं क्योंकि सभी प्लेटफॉर्म खरीददारी का करीब-करीब एक जैसा ही Experience (अनुभव) देते हैं। कम्पीटिशन के कारण कीमतों से छेड़छाड़ करने की तो कोई सोच भी नहीं सकता जबकि लेबर व प्रोपर्टी की कॉस्ट लगातार बढ़ती रहती है। कस्टमर, बाजार व कारोबार ऐसी व्यवस्था में आ गए हैं जहां प्रोडक्ट की कीमत के अलावा Experience (अनुभव) की कीमत चुकाने के लिए कस्टमर को तैयार करने के सबसे मुश्किल काम से ज्यादातर कारोबारी जूझ रहे हैं और कस्टमर वेल्यू की खोज में किसी के भी साथ जाने को तुरंत तैयार रहने लगा है। भला हो बड़े इंवेस्टरों और बड़ी कंपनियों का जो बेरोजगारी से जूझ रहे युवाओं को कुछ राहत देने में बड़ा रोल निभा रही है। Common Sense के हिसाब से टेक्नोलॉजी और नएपन के भरोसे अपनी जमीन तैयार करने वाले नए जमाने के बहुत कम कारोबार लम्बे समय तक बने रहने की सोच को साथ लेकर चलते है जिनसे समय निकलने के साथ इंवेस्टर और कस्टमर दोनों दूर होते जाते है और कैश फूंकने की पॉवर खत्म होने पर ऐसे कारोबारों का क्या होता है, इसके उदाहरणों की पिछले 4-5 सालों में कोई कमी नहीं है जो हर सेक्टर में मौजूद है।