एक दिन पाण्डव और कौरव वन में भ्रमण हेतु निकले, जिनमें साथ उनका एक कुत्ता भी था। वह कुत्ता भौंकता हुआ एकलव्य की कुटिया के पास गया और भौंकने लगा। जब एकलव्य ने उस कुत्ते को देखा तो उसने, कुत्ते को बिना घायल किए, उसके मुख्य को बाणों को इस प्रकार भर दिया कि वह भौंक न सके। जब अर्जुन ने यह अदभुत कौशल देखा तो वह चकित हो गया। वह मन ही मन सोचने लगा कि गुरु द्रोणाचार्य ने तो उसे संसार का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर बनाने का वचन दिया था। द्रोणाचार्य ने भी जब यह दृश्य देखा तो वे एकलव्य के पास पहुंचे और उससे पूछा तुम्हारे गुरु कौन हैं? एकलव्य ने प्रणाम करते हुए विनम्रता से कहा- गुरुदेव, आप ही मेरे गुरु हैं। तब द्रोणाचार्य ने गुरु दक्षिणा में एकलव्य से उसके दाहिने हाथ का अंगूठा मांग लिया। एकलव्य ने बिना क्षणभर विचार किये, गुरु की आज्ञा का पालन करते हुए तुरंत अपने दाहिने हाथ का अंगूटा काटकर गुरु दक्षिणा के रूप में, अंगूठे को गुरु चरणों में अर्पित कर दिया। इस प्रकार एकलव्य ने गुरु भक्ति, समर्पण और गुरु के प्रति श्रद्धा का अदभुत उदाहरण प्रस्तुत किया और उसने गुरु से बिना औपचारिक शिक्षा प्राप्त हुए ही केवल स्वयं के परिश्रम एवं श्रद्धा से सिद्धि प्राप्त की। एकलव्य का चरित्र भी त्याग, साधना और गुरु-श्रद्धा का प्रतीक माना जाता है।