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19-05-2026

‘अपने भीतर को सुन्दर बनायें’

  •  आचरण में परिवर्तन करें- परिवर्तन भी सतत होने वाली प्रक्रिया है। शनै: शनै: ऐसे में दोषों को जीतना है। साधना का लक्ष्य स्पष्ट होना चाहिये। प्रश्न है कि भावना परिवर्तन कैसे हो? जिन्दगी का मकसद क्या है? दोषों को जानकर, अंतर्मुखी होने का लक्ष्य रखें। भीतरी कमजोरियों को दूर करना है। बार गलतियां /भूलें कैसे मिटावें: माहौल बदलें, आवेग खत्म हो। विचार बदलें। सोच और चिंतन बदलें। संगत बदलें। स्ट्रेस के प्रति उपेक्षावान हो जायें। मंगल मैत्री का वाचन एवं मैत्री भावना को प्रबल करें। हमारी चेतना का रूपांतरण कैसे हो?जीवन में एक्सीलेंस कैसे मिले? बड़ी सोच का बड़ा जादू होता है। जैसा सोचेंगे-वैसा बनेगें। जिन्दगी को जंग न लगने दें। पहले अपने मन को बदलें। मनोबल को ऊंचा रखें। नये विचारों का स्वागत करें। जो बीत रहा है, वह समय नहीं जीवन है।जिंदगी को प्रयोगशाला बनायें। सांस का आलम्बन लें- साधन के साधन की सीढ़ी क्या है? शरीर की वीणा क्या है? ध्यान है मैं से मुक्ति की कला। वीणा के तार ढीले हैं? सांस को धूरी बनावें। सांस को आधार बनायें। समुधुर संगीत प्रफूटित होगा। मस्तिष्क हृदय नाभि को विकसित होने दें। पे्रम और घृणा का सह-अस्तित्व सम्भव नहीं है। अत: सांस को आधार बनाना है। सांस को गहरी, लयबध करना है। क्रिया की प्रतिक्रिया नहीं करनी है। संवेदनाओं से, विकारों से रियेक्शन नहीं करना है। वेग, संवेगों में उलझना नहीं है। चित्त को निर्मल करना है। सम्यक, आहार, सम्यक श्रम और सम्यक निद्रा से सम्भव है।

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‘अपने भीतर को सुन्दर बनायें’

 आचरण में परिवर्तन करें- परिवर्तन भी सतत होने वाली प्रक्रिया है। शनै: शनै: ऐसे में दोषों को जीतना है। साधना का लक्ष्य स्पष्ट होना चाहिये। प्रश्न है कि भावना परिवर्तन कैसे हो? जिन्दगी का मकसद क्या है? दोषों को जानकर, अंतर्मुखी होने का लक्ष्य रखें। भीतरी कमजोरियों को दूर करना है। बार गलतियां /भूलें कैसे मिटावें: माहौल बदलें, आवेग खत्म हो। विचार बदलें। सोच और चिंतन बदलें। संगत बदलें। स्ट्रेस के प्रति उपेक्षावान हो जायें। मंगल मैत्री का वाचन एवं मैत्री भावना को प्रबल करें। हमारी चेतना का रूपांतरण कैसे हो?जीवन में एक्सीलेंस कैसे मिले? बड़ी सोच का बड़ा जादू होता है। जैसा सोचेंगे-वैसा बनेगें। जिन्दगी को जंग न लगने दें। पहले अपने मन को बदलें। मनोबल को ऊंचा रखें। नये विचारों का स्वागत करें। जो बीत रहा है, वह समय नहीं जीवन है।जिंदगी को प्रयोगशाला बनायें। सांस का आलम्बन लें- साधन के साधन की सीढ़ी क्या है? शरीर की वीणा क्या है? ध्यान है मैं से मुक्ति की कला। वीणा के तार ढीले हैं? सांस को धूरी बनावें। सांस को आधार बनायें। समुधुर संगीत प्रफूटित होगा। मस्तिष्क हृदय नाभि को विकसित होने दें। पे्रम और घृणा का सह-अस्तित्व सम्भव नहीं है। अत: सांस को आधार बनाना है। सांस को गहरी, लयबध करना है। क्रिया की प्रतिक्रिया नहीं करनी है। संवेदनाओं से, विकारों से रियेक्शन नहीं करना है। वेग, संवेगों में उलझना नहीं है। चित्त को निर्मल करना है। सम्यक, आहार, सम्यक श्रम और सम्यक निद्रा से सम्भव है।


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