कहना गलत नहीं होगा कि आज पूरी मानव जाति किसी न किसी तरह के कष्टों से पीडि़त है। लोग दो तरह के कष्टों को सहते हैं। शारीरिक व मानसिक। शारीरिक पीड़ा के कई कारण हो सकते हैं, किंतु 90 प्रतिशत मानवीय कष्ट मानसिक होते हैं, जिसका कारण हमारे भीतर ही होता है। लोग हर रोज अपने लिये कष्ट पैदा करते हैं, वे गुस्सा, डर, नफरत, ईष्र्या और असुरक्षा से ग्रस्त हैं। यही दुनिया में अधिकतर लोगों की पीड़ा का कारण है। कष्टों के निर्माण की फैक्ट्री आपके मन में है। इसको बंद करें, धीरे-धीरे कष्ट दूर हो जायेंगे। जागरुकता की आवश्यकता है। यांत्रिक मानव मन न बनें। मृत्यु का सतत स्मरण बनाये रखें। शांत और शून्य चित्त बनायें। योग साधना-आत्म रूपांतरण दिशा है। अपनी चेतना को जगायें। क्रोध क्षणिक पागलपन है। आलस्य नहीं बल्कि स्फुरणा से जीयें। आत्मिक विकास ही विकास है। वासना की आग से बचें। चेतना का स्वर्ग जगायें। ध्यान साधना स्फूर्त अनुशासन जगाती है। अकाम अर्थात काम ऊर्जा का रूपानान्तरण करना है। अप्रमाद भावना रखें। जीवन का नजरिया बदलें क्योंकि रोबोट से अधिक जीवन का महत्व है। आजकल आधुनिकता का एक्सप्लोजन हो रहा है। जीवन में त्याग किया नहीं जाता है, त्याग हो जाता है। मन तो गति है, ध्यान गति से मुक्ति है। मन का चलना ही जीवन है।