देसी घी एवं दूध पाउडर में भयंकर गर्मी पडऩे एवं लिक्विड दूध की भारी शॉर्टेज बनने से तेजी का रुख बना हुआ है। अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में ऊंचे भाव होने से उक्त दोनों उत्पादों का बाजार और तेज लग रहा है, लेकिन मिलावट करने वाले इस कदर बाजारों में अपना वर्चस्व बना चुके हैं, जिससे बढिय़ा देसी घी निर्माताओं को मुकाबला करना कर पाना मुश्किल हो गया है। इनका मनोबल इतना बढ़ गया है, कि मंदिरों से लेकर श्मशान घाटों तक धड़ल्ले से मिलावटी घी का उपयोग होने लगा है। परम डेयरी लिमिटेड के चेयरमैन डॉ राजीव कुमार का कहना है कि मैं तो शुरू से ही देसी घी दूध पाउडर सहित सभी खाद्य पदार्थों में मिलावट का घोर विरोधी रहा हूं, लेकिन अब तक अथक परिश्रम के बावजूद भी इसका बढिय़ा परिणाम नहीं मिल पा रहा है। यूपी हरियाणा राजस्थान पंजाब बिहार मध्य प्रदेश आदि देसी घी उत्पादक मंडियों में 80 प्रतिशत देसी घी बिक रहे हैं, जिसका गैस क्रोमेटोग्राफी 60 प्रतिशत से नीचे आ रहा है, आगे 20 प्रतिशत ही देसी घी बाजारों में बिक रहे हैं या निर्माता कंपनियां बना रही है, जिनका जीसी 90 से 105 के बीच आ रहा है। सरकार द्वारा मिलावटी देसी घी पर समय-समय चेकिंग करके पकड़ा जाता है, लेकिन सरकार को अब जरूरत जीसी की टेस्टिंग करने की है तथा जो भी पकड़ा जाए, इतना अधिक पेनल्टी ठोक दी जाए, जिससे इस पर अंकुश लग सके। ऐसा देखा जाता है कि सैंपल विभाग मंडियों में जाकर चेकिंग करते है, लेकिन इसके उद्गम क्षेत्र (जहां बनता है) पर सख्ती करने की जरूरत है। जहां कॉलोनी में विभिन्न कंपनियों के रैपर, डिब्बे व टीन के साथ अराजक तत्व पकड़े जाते हैं। इसके अलावा बड़े-बड़े मंदिरों में जहां देसी घी के बूंदी के प्रसाद व मिठाईयां प्रसाद में बिकती हैं, उसकी चेकिंग करके प्रसाद कहां से आ रहा है, वहां से जड़ का पता लग सकता है। दूसरी ओर डेयरी इंडस्ट्रीज में देसी घी का उत्पादन लागत काफी महंगा हो गया है, जिससे निर्मित 9500 रुपए से नीचे का टीन नहीं पड़ रहा है, जबकि इस बाजार में 7500/8000 रुपए के माल ठिकाना पहुंच में हलवाइयों को बिक रहे हैं, अब उसमें भगवान ही जानते हैं की क्या मिलाया जाता है। वहीं प्रीमियम क्वालिटी के देसी घी 9500/9750 रुपए प्रति टीन के बीच बिक रहे हैं। इसमें भी निर्माता कंपनियों को एट पार में ही व्यापार करना पड़ रहा है। हालांकि इसका विरोध करने वाला इंडस्ट्रीज में अलग-थलग हो जाता है तथापि हमें राष्ट्र सहित में मिलावट का विरोध करने में ही संतुष्टि होती है। इस समय लिक्विड दूध के भाव 61/62 रुपए प्रति लीटर प्लांटों को खरीदना पड़ रहा है, इसमें भी क्वालिटी उत्कृष्ट दूध नहीं मिल पा रही है। दूसरी ओर काफी खरीद में प्रतिस्पर्धा करनी पड़ रही है।, क्योंकि अधिकतर उत्पादक क्षेत्रों में मौसम का तापमान 45-46 डिग्री सेंटीग्रेट को पार कर गया है, जिससे लिक्विड दूध की कुल उपलब्धि मुश्किल से 70-75 लाख लीटर दैनिक रह गई है। हम मानते हैं कि मंडियों में देसी घी की बिक्री अनुकूल नहीं है, लेकिन किसी भी कंपनी के पास बटर व देसी घी का स्टॉक नहीं है। इधर दूध पाउडर की तरफ देखें तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में 3547-3555 डॉलर प्रति टन एवं बटर के 5525-5550 डॉलर प्रति टन को पार कर गया है। दूसरी ओर तमिलनाडु एवं महाराष्ट्र के पाउडर इस बार 285/300 रुपए प्रति किलो के बीच चल रहे हैं, जबकि उत्तर भारत के प्रीमियम क्वालिटी के माल 315/328 रुपए प्रति किलो के बीच चल रहे हैं। गुजरात को ऑपरेटिव्स के पास भी ज्यादा माल नहीं है, तमिलनाडु कर्नाटक राजस्थान मध्य प्रदेश एवं उत्तर प्रदेश कोऑपरेटिव के पास भी माल का प्रेशर नहीं सुनने में आ रहा है, जिससे उत्तर भारत में पड़ते नहीं लग रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजारों में ऊंचे भाव होने से निर्यातकों की चौतरफा बटर एवं दूध पाउडर में मांग बनी हुई है, इसे देखते हुए जल्दी इसमें 20 रुपए प्रति किलो की और तेजी लग रही है।