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18-05-2026

कमोडिटी के लिए कठिन दौर : सरकार व जनता के लिए आत्मसंयम का समय!

  •  जब दुनिया के किसी भी देश की सरकार आवश्यक वस्तुओं और कमोडिटीज के कारोबार को प्रभावित करने वाला कोई निर्णय लेती है, तो यह अर्थव्यवस्था में आई दरार का संकेत होता है। अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच युद्ध शुरू होने के बाद से ही दुनिया के अधिकांश देशों की अर्थव्यवस्था डगमगा रही है। भारत में इसका असर अब तक शेयर बाजार और मुद्रा कारोबार पर ही देखा गया है, लेकिन पश्चिम बंगाल समेत चार राज्यों में विधानसभा चुनाव समाप्त होने के बाद, पिछले सप्ताह में सरकार द्वारा लिए गए फैसलों की गति को देखते हुए ऐसा लगता है कि अब भारतीयों को संयम बरतने की जरूरत है। पिछले एक सप्ताह में, भारत में दूध से लेकर मुद्रा, बुलियन से लेकर ईंधन तक, कई क्षेत्रों में मुद्रास्फीति, मूल्य वृद्धि, मंदी और कमी के संकेत मिले हैं। अप्रैल के अंत तक उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 7.7 अरब डॉलर घटकर 690 अरब डॉलर रह गया है। स्वर्ण भंडार 5 अरब डॉलर घटकर 115 अरब डॉलर रह गया है। विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियां 2.70 अरब डॉलर घटकर 551 अरब डॉलर रह गई हैं। ये सभी मुद्दे भारत को विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने से रोक सकते हैं। यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है, तो पिछले दस वर्षों में सरकार द्वारा देश को आर्थिक महाशक्ति बनाने में हासिल की गई सफलता उलट सकती है। घरेलू बाजार की बात करें तो सोने के आयात पर कुल शुल्क 5 पर्सेंट और 4 पर्सेंट बढ़ाकर 9 पर्सेंट कर दिया गया है, यानी कुल शुल्क 16पर्सेंट हो गया है। कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी रहने के कारण, खाड़ी युद्ध के बाद से मुनाफा कमा रही तेल कंपनियां अब प्रतिदिन 1000 से 1200 करोड़ रुपये का नुकसान झेल रही हैं। घरेलू बाजार में चीनी की आपूर्ति बनाए रखने के लिए भारत ने रातों-रात निर्यात रोक दिया है। खाड़ी युद्ध के कारण तरबूज और केले जैसे हमारे नाशवान उत्पादों का निर्यात बाधित हुआ है, जिससे विदेशी मुद्रा आय में कमी आई है। दूसरी ओर, सस्ते कच्चे तेल की उपलब्धता न होने से समस्या और भी बढ़ रही है। भारत के कुल आयात बिल में कच्चे तेल और सोने का हिस्सा 200 अरब डॉलर से अधिक है। यदि निर्यात घटता है और आयात जारी रहता है, तो विदेशी मुद्रा भंडार में होने वाली कमी को समझना आसान है। इसी वजह से पीएम नया सोना खरीदने से इनकार करते हैं और विदेश यात्रा न करने की सलाह देते हैं। क्योंकि कच्चे तेल का आयात पूरी तरह से रोकना संभव नहीं है। दूध महंगा होने से सभी दूध उत्पादों पर असर पड़ेगा। पेट्रोल और डीजल महंगे होने से अन्य सभी चीजें भी महंगी हो जाएंगी। परिणामस्वरूप, हमारी विकास दर घट सकती है। थोक मूल्य सूचकांक 3.9 प्रतिशत से बढक़र 8.3 प्रतिशत हो गया है।अर्थशास्त्र का सामान्य सिद्धांत यह है कि समस्या शुरू होने पर सब कुछ आसान लगता है, लेकिन समय के साथ इसके परिणाम दिखने लगते हैं। जब युद्ध शुरू हुआ, तब हमारे पास कच्चे तेल का पर्याप्त भंडार था, लेकिन युद्ध के तीन महीने बीत जाने के बाद भी शांति का कोई आसार नहीं है। इसलिए, अब संयम से समय बिताना आवश्यक है। हमारे सोशल मीडिया के ‘बादशाह’ पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका और ईरान की स्थिति पर मजाक उड़ाते थे, लेकिन जब अपना बच्चा भूखा हो, तो माता-पिता यह कहकर खुश नहीं हो सकते कि दूसरे भी भूखे हैं। मोदी जी की सरकार इस दर्द को समझती है, इसीलिए सरकार ने इस बार खुद संयम बरतते हुए खर्च कम करने की पहल की है। आगामी मानसून में अभी भी अल नीनो का खतरा दिखाई दे रहा है। खरीफ की फसल खराब होने की स्थिति में उत्पन्न होने वाली समस्याओं के लिए भी हमें तैयार रहना होगा। इन आंकड़ों को पढक़र घबराने की जरूरत नहीं है, लेकिन सावधानी और संयम बरतने की आदत डालना जरूरी है। संभवत: गेहूं, चावल या अन्य कृषि उत्पादों के निर्यात पर भी प्रतिबंध लग सकता है।

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कमोडिटी के लिए कठिन दौर : सरकार व जनता के लिए आत्मसंयम का समय!

 जब दुनिया के किसी भी देश की सरकार आवश्यक वस्तुओं और कमोडिटीज के कारोबार को प्रभावित करने वाला कोई निर्णय लेती है, तो यह अर्थव्यवस्था में आई दरार का संकेत होता है। अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच युद्ध शुरू होने के बाद से ही दुनिया के अधिकांश देशों की अर्थव्यवस्था डगमगा रही है। भारत में इसका असर अब तक शेयर बाजार और मुद्रा कारोबार पर ही देखा गया है, लेकिन पश्चिम बंगाल समेत चार राज्यों में विधानसभा चुनाव समाप्त होने के बाद, पिछले सप्ताह में सरकार द्वारा लिए गए फैसलों की गति को देखते हुए ऐसा लगता है कि अब भारतीयों को संयम बरतने की जरूरत है। पिछले एक सप्ताह में, भारत में दूध से लेकर मुद्रा, बुलियन से लेकर ईंधन तक, कई क्षेत्रों में मुद्रास्फीति, मूल्य वृद्धि, मंदी और कमी के संकेत मिले हैं। अप्रैल के अंत तक उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 7.7 अरब डॉलर घटकर 690 अरब डॉलर रह गया है। स्वर्ण भंडार 5 अरब डॉलर घटकर 115 अरब डॉलर रह गया है। विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियां 2.70 अरब डॉलर घटकर 551 अरब डॉलर रह गई हैं। ये सभी मुद्दे भारत को विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने से रोक सकते हैं। यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है, तो पिछले दस वर्षों में सरकार द्वारा देश को आर्थिक महाशक्ति बनाने में हासिल की गई सफलता उलट सकती है। घरेलू बाजार की बात करें तो सोने के आयात पर कुल शुल्क 5 पर्सेंट और 4 पर्सेंट बढ़ाकर 9 पर्सेंट कर दिया गया है, यानी कुल शुल्क 16पर्सेंट हो गया है। कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी रहने के कारण, खाड़ी युद्ध के बाद से मुनाफा कमा रही तेल कंपनियां अब प्रतिदिन 1000 से 1200 करोड़ रुपये का नुकसान झेल रही हैं। घरेलू बाजार में चीनी की आपूर्ति बनाए रखने के लिए भारत ने रातों-रात निर्यात रोक दिया है। खाड़ी युद्ध के कारण तरबूज और केले जैसे हमारे नाशवान उत्पादों का निर्यात बाधित हुआ है, जिससे विदेशी मुद्रा आय में कमी आई है। दूसरी ओर, सस्ते कच्चे तेल की उपलब्धता न होने से समस्या और भी बढ़ रही है। भारत के कुल आयात बिल में कच्चे तेल और सोने का हिस्सा 200 अरब डॉलर से अधिक है। यदि निर्यात घटता है और आयात जारी रहता है, तो विदेशी मुद्रा भंडार में होने वाली कमी को समझना आसान है। इसी वजह से पीएम नया सोना खरीदने से इनकार करते हैं और विदेश यात्रा न करने की सलाह देते हैं। क्योंकि कच्चे तेल का आयात पूरी तरह से रोकना संभव नहीं है। दूध महंगा होने से सभी दूध उत्पादों पर असर पड़ेगा। पेट्रोल और डीजल महंगे होने से अन्य सभी चीजें भी महंगी हो जाएंगी। परिणामस्वरूप, हमारी विकास दर घट सकती है। थोक मूल्य सूचकांक 3.9 प्रतिशत से बढक़र 8.3 प्रतिशत हो गया है।अर्थशास्त्र का सामान्य सिद्धांत यह है कि समस्या शुरू होने पर सब कुछ आसान लगता है, लेकिन समय के साथ इसके परिणाम दिखने लगते हैं। जब युद्ध शुरू हुआ, तब हमारे पास कच्चे तेल का पर्याप्त भंडार था, लेकिन युद्ध के तीन महीने बीत जाने के बाद भी शांति का कोई आसार नहीं है। इसलिए, अब संयम से समय बिताना आवश्यक है। हमारे सोशल मीडिया के ‘बादशाह’ पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका और ईरान की स्थिति पर मजाक उड़ाते थे, लेकिन जब अपना बच्चा भूखा हो, तो माता-पिता यह कहकर खुश नहीं हो सकते कि दूसरे भी भूखे हैं। मोदी जी की सरकार इस दर्द को समझती है, इसीलिए सरकार ने इस बार खुद संयम बरतते हुए खर्च कम करने की पहल की है। आगामी मानसून में अभी भी अल नीनो का खतरा दिखाई दे रहा है। खरीफ की फसल खराब होने की स्थिति में उत्पन्न होने वाली समस्याओं के लिए भी हमें तैयार रहना होगा। इन आंकड़ों को पढक़र घबराने की जरूरत नहीं है, लेकिन सावधानी और संयम बरतने की आदत डालना जरूरी है। संभवत: गेहूं, चावल या अन्य कृषि उत्पादों के निर्यात पर भी प्रतिबंध लग सकता है।


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