काबुली चने में कारोबारी सन्नाटा पिछले 6 महीने से चल रहा था, जो 10 दिनों से थोड़ी सी पूछ परख आते ही तेजी बन गई है। पूर्व में जितना फसल का अनुमान लगाया गया था, उतना नहीं है। यही कारण है कि बाजार अंदरुनी मजबूत हो गया है तथा मंडियों में आवक को देखते हुए वर्तमान व्यापार में भरपूर लाभ दे जाएगा। काबुली चने की बिजाई कम के साथ-साथ सीजन पर बेमौसमी बरसात से बोए हुए क्षेत्र में बीज ही नष्ट हो गया, यही कारण है कि मई का दूसरा पखवाड़ा चल रहा है तथा मंडियों में माल का प्रेशर कहीं भी नहीं है। हां, यह बात सही है कि पुराना माल इस बार ज्यादा बचा है। गत वर्ष काबुली चने का उत्पादन 31 लाख मैट्रिक टन हुआ था, वह इस बार मुश्किल से 18-20 लाख मैट्रिक टन रह जाने की अटकलें लगाई जाने लगी हैं। गत वर्ष नया पुराना मिलाकर काबुली चने का स्टॉक 36 लाख मीट्रिक टन की उपलब्धि रही। वह इस बार 24 लाख मीट्रिक टन नया पुराना मिलाकर वर्तमान में अनुमान लगाया जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय बाजारों में ऊंचे भाव होने से इस बार निर्यात के पड़ते हमारे लगेंगे तथा आयात नहीं होगा। पिछले दिनों आने-पौने भाव में बढिय़ा तथा मोटा एक दो प्रतिशत डंक वाला काबुली चना 90 प्रतिशत निबट चुका है। तथा नया माल आ रहा है, लेकिन किसी भी मंडी में माल का प्रेशर नहीं है। गौरतलब है कि पिछले सीजन में जो काबली चना 71/72 रुपए कच्चा माल बिका था, उसके भाव नीचे में 57/60 रुपए प्रति किलो पिछले महीने रह जाने के बाद एक पखवाड़े से थोड़ी सी ग्राहकी सुधरने से उसके भाव 60/62 रुपए बोलने लगे हैं, बढिय़ा महाराष्ट्र का बिना छना माल 65 रुपए तक बिक गया है। इस बार महाराष्ट्र में फसल कम आई है। बाजारों में रुपए की काफी तंगी से जितना मंदा आना था, वह आ चुका है। अब वर्तमान भाव से किसी भी देश से पड़ता नहीं लग रहा है। उधर इजिप्ट के देशों में काबुली चने काफी निपट चुके हैं। फिलहाल वहां इजरायल ईरान अमेरिका लड़ाई से अभी निर्यात नहीं है, लेकिन लड़ाई बंद होने के बाद पाइपलाइन में माल नहीं रहेगा, इसलिए चौतरफा मांग निकल जाएगी। इसके अलावा हमारा माल चालू माह में टेंडर में काफी खप गया है। गौरतलब है कि ग्राहकी का बाजारों में पूरी तरह सन्नाटा चालू सप्ताह में रहा, यहां बाजार धीरे-धीरे सुधर रहा है। यहां उत्पादक मंडियों की अपेक्षा भाव नीचे चल रहे हैं, इसलिए वर्तमान भाव में कुछ दिन प्रतिक्षा के बाद लाभदायक लग रहा है ।